एक नदी रेत् के नीचे, भाग-3 ---
सुबह सात चालिस
आँख खुलते ही खिड़की से पर्दा हटाया,
देखा ! सूरज अभी भी कोहरे की चादर ओढ़े हैं,
ठण्ड से बचने के लिए
थोड़ी थोड़ी देर में चादर से झांक लेते हैं
रात - चाँद भी ठण्ड और कोहरे की वजह से अँधेरे की चादर ओढ़े कहीं छुपा रहा होगा।
मैंने भी उंकड़ू हो कर कम्बल सिर के ऊपर तक खींच ली ,
हाथ बढ़ा सिरहाने स्टूल पे रखी चाय को एक हाथ से उठाया,
और दूसरा हाथ तकिये के नीचे मोबाइल ढूंढने में व्यस्त हो गया।
मोबाइल में नज़रें व्हाटस ऐप पे गयी आदतन,
उम्मीद के अनुसार उसने आज भी अपनी तरफ से "सुप्रभात' का मेसेज नहीं भेजा थ।
जिसे भेज कर मैंने दिन की शुरआत की,
हलाकि उसने रात ग्यारह पैंतीस पे मेरे द्वारा भेजे गए मेसेज को पढ़ लिया था। व्हाट्स ऐप पे सही के दो नीले नीले निशान इस बात की गवाही दे रहे थे ,
आदतन उसने मेसेज पढ़ लिया था पर प्रतिक्रिया नहीं दी हमेशा की तरह-
चाय का स्वाद कुछ कसैला कसैला हो गया ये देख के,
पहले तो मैंने इस कसैले घूँट को थूँकना चाहा पर इरादा मुल्तवी कर दिया
वजह पास में पीकदान रखता नहीं और इतनी ठण्ड में कौन उठत्ता वाशबेसिन तक जाने को , लिहाज़ा इस कसैलेपन को पी जाना ही बेहतर समझा और
मन के पटल पे कहानी का आगे का भाग लिखने लगा,
जी तो पाठकों आप को कहानी आगे सुनाने के पहले एक बार फिर याद दिला दूँ और आगाह कर दूँ कि अगर आप कहानी का शीर्षक पढ़ के ये सोच रहे होंगे कि ये कहने रूमानी होगी तो शायद आप निराश होंगे और लगे हाथ ये भी बता दूँ फिर से कि मेरी कहानी शिवानी की कहनियों की नायिकाओं जैसी खूबसूरत भी नहीं है और उसके जीवन में घटनाओं के बहुत नाटकीय मोड़ भी नहीं आये हैं एक दो को छोड़.
हाँ मेरी कहानी का नाइका की सुतवां नाक बड़ी - बड़ी कजरारी आँखे और चांदी सा रंग तो नहीं है पर गौर से देखने पे इनसे किसी तर कमतर नहीं है.
वो बड़े से बड़े दुःख में बुक्का फाड् के रोती नही है और न ही जीवन से निराश हो के एकांत के गुप्प अँधेरे में ही अपने को बंद करती है
प्रेम के लिए भी उसके दिल में एक अलग तरह का ठहरा हुआ आदर्श और व्यवहारिकता में लिपटा हुआ सा भाव है जिसे उसने शिद्दत से निभाने की कोशिश की है पर प्यार उसके जीवन का केंद्रीय तत्व नहीं रहा है और न है - ऐसा मुझे लगता है अभी तक
खैर उसके बारे में मै कुछ कहूँ तो मज़ा न आएगा आप उसी के शब्दों में पढ़ें,
मेरे और उसके बीच हुए एक संवाद के माध्यम से
- हूँ
- जी
- कैसे हो
- ठीक हूँ
- एक बात पूछूँ
-जी
- तुम इतनी इंट्रोवर्ट क्यूँ हो?
- पता नहीं
- ओह तुम्हे अपने बारे में ही नहीं पता
- जी मै इतना नहीं सोचती अपने बारे में
-क्यूँ
- पता नहीं
- उफ्फ
- जी इसमें उफ्फ की बात ही नहीं है, कभी इतना टाइम ही नहीं रहा कि ये सब सोचूँ
- हूँ ऐसा तो नहीं है हर इंसान अपने बारे में सोचता तो है ही ?
- जी हो सकता है पर मै इस तरह से नहीं सोच पाती जैसा आप सोच पाते हो,
वैसे भी आप राइटर हो अच्छे से लिख और बता पाते हो - मै नहीं कर पाती ऐसा
- कोई नहीं तो तुम अपने बारे में सिलसिले वॉर ढंग से बताओ तो मै कुछ समझूँ
-समझने से क्या होगा ?
- अरे होगा तो कुछ नहीं, इंसान को अपनी दिल की बात भी कभी कभी कर लेनी चाहिए
(कुछ देर सन्नाटा फिर कुछ शब्द हवा में तैरने लगे )
- पुष्पा दीदी वाले हादसे के बाद से मै इतना डर गयी थी कि इश्क़ मुहब्बत के बारे में सोचने से भी डरने लगी थी,
और फिर छोटे भाई बहनो की ज़िम्मेदारी भी थी, पहले दीदी कुछ हाथ बटा देती थी पर बाद में लगभग सारा काम मेरे
ही जिम्मे पढ़ने लगा था।
- हूँ
- घर के काम से फुर्सत मिलती तो अपनी पढ़ाई लिखाई और छोटे भाई बहनो के होमवर्क में भी कई बार सहायता करवानी पड़ती
ऐसे में अपने बारे में कब सोचती
- ओह ,,
- पिता जी ज़रा ज़रा सी बात में गुस्सा हो जाते घर का वातावरण बेहद तनाव पूर्ण हो जाता- बड़े होते भाई लोग भी पैनी नज़र हम बड़ी
होती बहनों पे रखते कही भी किसी से बात चीत करने पे पाबंदी बहार आना जाना भी लिमिटेड ही था
- जी
- फिर ऐसे में इंसान अंतर्मुखी नहीं होगा तो क्या होगा
- जी समझ सकता हूँ
(कुछ देर सन्नाटा )
- जी अभी फ़ोन रखते हैं फिर बात करेंगे कुछ काम आ गया है - बाय
मै फ़ोन को देखते हुए उसके अंदर के खालीपन को सुन रहा था
शेष अगले अंक में -------
मुकेश इलाहाबादी ---
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