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Wednesday, 18 February 2026

धूप की उँगलियाँ

 धूप की उँगलियाँ

खिड़की से भीतर आईं

धीरे, लगभग संकोच से।


उन्होंने पहले

दीवार को छुआ,

फिर बिस्तर की सिलवटों को,

और आखिर में

तुम्हारे गाल पर टिक गईं।


तुम अब भी सो रही थीं

पर होंठों पर

हल्की-सी मुस्कान थी,

जैसे तुम्हें उस स्पर्श का

आभास हो।


धूप की उँगलियाँ

तुम्हारी पलकों पर फिसलीं,

बालों में उलझीं,

और कमरे को

एक उजली फुसफुसाहट से भर गईं।


मैंने देखा

सुबह दरअसल

सूरज नहीं लाता,

तुम्हारे चेहरे पर ठहरी

इन सुनहरी उँगलियों से ही

दिन शुरू होता है।


मुकेश ,,,,,


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