एक गिरह है
जो खुलना नहीं चाहती।
मैंने कई बार
उसे उँगलियों से टटोला,
दाँतों से खींचा,
तर्क से समझाया,
पर वह मुस्कुरा कर
और कस जाती है।
फिर एक दिन
मैंने उसे छोड़ दिया।
तब पहली बार सुना,
उसके भीतर
हल्की-सी धड़कन है।
जैसे दो धागों के मिलन से
एक तीसरी चीज़ जन्म ले रही हो,
न पूरी गाँठ,
न पूरा विस्तार,
बस एक स्पंदन।
मुझे लगा
शायद गिरह रुकावट नहीं,
दो दिशाओं का आलिंगन है।
जहाँ अतीत
भविष्य से चुपचाप मिलता है,
जहाँ पछतावा
अनुभव में बदलता है,
जहाँ असफलता
धीरे-धीरे समझ में ढलती है।
हर गिरह के भीतर
एक बीज छुपा है,
जो तभी फूटता है
जब हम उसे
जबरन खोलना छोड़ देते हैं।
मैं अब
अपनी गिरहों को
सुलझाने की जल्दी में नहीं हूँ।
वे मेरी नसों में
रक्त की तरह बह रही हैं,
मेरी चेतना में
अदृश्य संरचना बनाकर।
शायद जीवन
सीधी रेखा नहीं,
गिरहों का वृत्त है,
जहाँ हर उलझन
किसी गहरे अर्थ की चौखट है।
और मैं
अब उस चौखट पर खड़ा हूँ.
गिरह को समस्या नहीं,
द्वार मानकर।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,
No comments:
Post a Comment