Pages

Wednesday, 18 February 2026

मैं तुम्हें गुदगुदा कर हँसाना चाहता हूँ

 मैं तुम्हें

गुदगुदा कर हँसाना चाहता हूँ,


जैसे सर्द सुबह की धूप

अचानक कंबल के कोने से

अंदर चली आए

और नींद की सिलवटों में

हल्की-सी गर्मी भर दे।


तुम्हारी गंभीरता के नीचे

जो एक बच्ची छुपी है,

उसके पैरों में

मैं शरारत के छोटे-छोटे पंख बाँधना चाहता हूँ।


ताकि वह दौड़े,

बिना वजह,

बिना कारण,

बस हँसी की दिशा में।


तुम्हारी पलकों पर

दिन भर की थकान जो जम जाती है,

मैं उसे उँगलियों से नहीं,

अपने बेवक़ूफ़ से चुटकुलों से

झाड़ देना चाहता हूँ।


तुम जब सोच में डूब जाती हो,

मैं तुम्हारे विचारों की गंभीर किताब में

एक रंगीन पन्ना रख देना चाहता हूँ

जिस पर लिखा हो

कि दुनिया इतनी भी सख़्त नहीं

जितनी हम समझ लेते हैं।


मैं तुम्हें गुदगुदा कर हँसाना चाहता हूँ,

ताकि तुम्हारी हँसी

दीवारों से टकराकर लौटे,

और मेरे भीतर भी

कुछ उजाला कर जाए।


क्योंकि सच तो यह है,

तुम्हारी हँसी

मेरे लिए सिर्फ़ आवाज़ नहीं,

एक भरोसा है।


कि अभी भी

हमारे बीच

कुछ हल्का,

कुछ मासूम,

कुछ बेवजह

ज़िंदा है।


और जब तुम हँसती हो,

तो लगता है

जैसे मेरी अपनी गिरहें भी

थोड़ी ढीली पड़ जाती हैं।


इसलिए

मैं तुम्हें

बार-बार,

हर उदासी के किनारे पर

गुदगुदा कर हँसाना चाहता हूँ।


मुकेश ,,,,,,,

No comments:

Post a Comment