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Wednesday, 18 February 2026

हवा के पुल पर ख़्वाब की महक – तीसरा सफ़्हा

 हवा के पुल पर

आज रात धुंध कुछ और गहरी है,

जैसे याद ने अपने चारों तरफ़

एक महीन चादर तान दी हो।


दूसरे किनारे की हल्की-सी आहट

अब दिखाई नहीं देती,

पर महसूस होती है

रूह के किसी गुप्त दरवाज़े पर

धीरे-धीरे दस्तक देती हुई।


मैंने इस पुल से पूछा,

क्या हर गुज़र

मिलन तक जाता है?

वह मुस्कुराया,

और अपनी लकड़ी की नसों में

बहती हवा को सुनने लगा।


कहा,

मिलन कोई जगह नहीं,

एक स्थिति है;

जहाँ तुम

अपने भीतर की तन्हाई से

हाथ मिला लेते हो।


रात की नमी

अब शब्दों में उतरने लगी है,

हर हरफ़

भीतर के कुएँ से

खींचा गया पानी है,

थोड़ा खारा,

थोड़ा मीठा,

मगर प्यास के क़रीब।


तुम्हारा नाम

अब लफ़्ज़ नहीं रहा,

वह एक कंपन है,

जिसे मैं सांस में भरता हूँ

और खामोशी में छोड़ देता हूँ।


इस पुल पर चलते हुए

मैंने देखा,

मेरी परछाईं मुझसे आगे चल रही है,

जैसे वह पहले ही जानती हो

कि कौन-सा मोड़

इश्क़ की तरफ़ मुड़ता है।


वक़्त यहाँ

अपनी जेबें खाली कर देता है,

बीते लम्हों के सिक्के

धीरे-धीरे गिरते हैं

और मिट्टी में गुम हो जाते हैं।


सिर्फ़ एहसास बचता है

नर्म, मगर अडिग,

जैसे किसी सूफ़ी की निगाह

जो देखती कम,

महसूस ज़्यादा करती है।


हवा का यह पुल

अब सवाल नहीं करता,

वह बस सहारा देता है,

उन पलों को

जो गिरते-गिरते

अचानक पर बन जाते हैं।


और मैं,

इन परों की हल्की थरथराहट में

तुम्हारी अनुपस्थिति को

उपस्थिति की तरह जीता हूँ।


क्योंकि तीसरे सफ़्हे पर आकर

समझ में आता है

इश्क़ किसी को पाने का नाम नहीं,

ख़ुद को खोते-खोते

एक गहरी रोशनी पा लेना है।


और वही रोशनी

इस पुल की लकड़ी में

धीरे-धीरे उतर रही है

जिस पर हर क़दम

अब दुआ-सा महसूस होता है।


मुकेश ,,,,,,,

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