सिगरेट की आख़िरी लौ
धीरे-धीरे मेरी उँगलियों तक आ पहुँची,
और धुआँ
तुम्हारे नाम की तरह
हवा में घुलता चला गया।
अजीब बात है,
तुम भी धुएँ जैसी ही थीं,
हथेली पर ठहरती नहीं,
पर दिल की दरारों में
अपनी महक छोड़ जाती थीं।
मैंने कई बार
तुम्हें पकड़कर रखने की कोशिश की,
पर तुम
हर बार
एक धुएँ की परत बनकर
आँखों में चुभ गईं।
अब सिगरेट बुझती है
और मैं सीख रहा हूँ,
कुछ रिश्ते
कश की तरह होते हैं,
क्षण भर गर्म,
क्षण भर रोशनी,
और फिर
बस राख,
बस धुआँ,
बस तुम।
मुकेश्,,,,
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