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Wednesday, 18 February 2026

गुलमोहर का पेड़ और खाली बेंच

 गुलमोहर का पेड़

आज भी उतना ही दहकता है,

लाल फूलों में जैसे

किसी अनकहे इकरार की आँच भरी हो।


उसके नीचे

वही खाली बेंच रखी है,

लकड़ी की सतह पर

समय की महीन दरारें,

और दरारों में

रुकी हुई दोपहरें।


कभी यहाँ

दो साए बैठते थे,

धूप आधी-आधी बाँटते हुए,

हवा में धीमे-धीमे

किसी आने वाले कल का ज़िक्र करते हुए।


अब बेंच अकेली है,

पर तन्हा नहीं,

उस पर झरे हुए फूल

किसी पुरानी बातचीत की

लाल विराम-चिह्न जैसे पड़े हैं।


गुलमोहर की छाँव

पूरा सुकून नहीं देती,

बस एक हल्की-सी ठहरन,

जैसे याद

जो चुभती भी है

और सहलाती भी।


जब हवा चलती है,

फूल बेंच पर गिरते हैं,

एक-एक कर,

बिना आवाज़ के;

और मैं सोचता हूँ,

क्या यादें भी ऐसे ही उतरती हैं

दिल की खाली सतह पर?


शाम ढलती है,

पेड़ के रंग और गहरे हो जाते हैं,

बेंच की परछाईं लंबी,

जैसे इंतज़ार

अपना क़द बढ़ा रहा हो।


मैं पास जाकर बैठता हूँ,

उस खाली जगह पर

जहाँ कभी कोई और बैठा था;

लकड़ी की ठंडक में

अब भी हल्की-सी गर्माहट है,

शायद धूप की,

शायद किसी स्पर्श की।


गुलमोहर का पेड़

हर साल फिर खिल उठता है,

पर बेंच

उसी जगह ठहरी रहती है

जैसे उसे मालूम हो

कि कुछ लोग लौटकर नहीं आते,

सिर्फ़ उनकी आहट लौटती है।


और उस आहट में

पेड़ की पत्तियाँ हिलती हैं,

फूल झरते हैं,

और खाली बेंच

थोड़ी देर के लिए

कम खाली लगने लगती है।


मुकेश ,,,,

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