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Thursday, 19 February 2026

स्थगन,,,

 स्थगन,,,

एक उम्र के बाद
जाना था मुझे
बहुत सारे तीर्थो में
करने थे बहुत सारे देवताओं के दर्शन
करनी थी प्रार्थनाएँ अपने और अपनों की खुशी के लिए
रगड़नी थी नाक
बहुत सारे किये और अनकिये पापों के लिए
खोलने थे उन मन्नतों के धागे जो पूर्ण हो चुके हैं
माननी थी बहुत सारी मन्नतें
उन ख्वाहिशों के लिए जो
अभी भी अपूर्ण हैं
पर मैंने जाना स्थगित किया या मुल्तवी किया
(किसी न किसी बात को ले कर )
एक वक़्त ऐसा भी था
(जवानी के दिनों में - जो सच्चे अर्थों में आयी ही नहीं )
जाना चाहता था अजीज़ मित्रों एक साथ
गोवा
पीनी थी बियर और अधनंगे लेटना था
समंदर के किनारे की सुनहरी धूप में
देखते हुए समंदर का मीलों फैला नीला जल
और देखना था बेलिबास सौन्दर्य
पर ये भी ज़िंदगी की आपा धापी ने
इसे भी किया स्थगित किया मैंने - हमेशा
मुझे जाना था
और शामिल होना था उस भीड़ में
जो अपनी अस्मिता और अन्याय के साथ लड़ती
आयी हैं
पर मैंने व्यस्तता की ढाल के पीछे
अपनी कायरता छुपाते हुए
स्थगित किया हमेशा
मै जाना चाहता था
हिमालय और फतह करना था सबसे ऊंची चोटी
पर तेन ज़िंग बाजी मार गया
मेरा जाना स्थगित ही होता रहा
मै नाव में चढ़ के ढूंढना चाहता था
एक नयी दुनिया
पर उसे भी कोलम्बस ने ढूंढ निकाला
मेरा जाना स्थगित ही होता रहा
मै चाँद पर भी जाना चाहता था पर
वहाँ भी कुछ और वैज्ञानिक बाजी मार गए
मेरी इच्छा के स्थगन के चलते
और आज भी मेरे स्थगन
जारी हैं बदस्तूर
कभी अपनी सेहत
तो कभी अर्थाभाव
तो कभी दूसरी समस्याएं
तो कभी तीसरी समस्याएँ
और अब तो लगता है
लड़ने नहीं जा पाऊँगा बलात्कृत होती
स्त्रियों और महिलाओं के लिए
शामिल नहीं होने जाऊँगा लव जिहाद की
शिकार होती लड़कियों के लिए लड़ने
न ही जाऊँगा दान पात्र ले कर अच्छी शिक्षा के अभाव
में दम तोड़ते बाल श्रमिकों के पास
और न ही जा पाऊँगा भूखे व् नंगे साथियों के लिए
कुछ करने की खातिर
यहाँ तक कि
मै अब भी नहीं जा पाऊँगा
बांग्ला देश में मरते हिन्दुओं के साथ खड़ा होने के लिए
और शायद,
आज भी अपने आलस्य और स्वार्थ वश
स्थगित कर दूंगा
जाना उस भीड़ के साथ
जो लड़ रही है
भारत के स्वाभिमान के लिए
हिंदी हिन्दू हिंदुस्तान के लिए
मुकेश इलाहाबादी -----------

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