शून्य (नागार्जुन के नाम)
मैंने
होने को पकड़ा,
वह फिसल गया।
न होने को थामा,
वह भी
टूट गया।
तब जाना
जो है
वह भी नहीं,
जो नहीं है
वह भी नहीं।
बीच की इस दरार में
जो ठहरता है,
वही
शून्य है।
शून्य
खालीपन नहीं,
यह
सबका
छूट जाना है।
जब कुछ बचा ही नहीं
पकड़ने को,
तभी
करुणा
अपने आप
उग आई।
न मैं,
न तुम,
न जगत
फिर भी
सब
यहीं है।
मुकेश्,,
No comments:
Post a Comment