प्रथमदृष्टया उसे आकर्षक की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता है,
हाँ गौर से देखने पर वो कुछ कुछ नहीं एक हद तक बेहद आकर्षक सी लगने लगती है.
अगर वक़्त की खुंखार बिल्ली ने उसके सांवले चेहरे पे तमाम खरोंचे न लगा रखी होती,
या, ज़िंदगी ने उसके चेहरे पे दुःख और संघर्ष की राख न पोती होती तो निःसंदेह वो एक बेहद आकर्षक व्यक्तित्व की मालकिन होती।
उसे देख कर एक और बात जो खयाल में आती है, वो ये कि, उसके अंदर एक नाज़ुक , अल्हड़ और नखरीली प्रेमिका के कोई गुण नज़र नहीं आते,
या यूँ कह लो उसे देख कर ये कहा जा सकता है उससे प्रेम के अपेक्षा रखना व्यर्थ होगी।
अक्सर ऐसा पाया गया है ऐसी महिलाओं से प्रेम के नाम पे या तो आदर्शवादी या दुनियादारी की की सामान्य सी बातें की जा सकती हैं पर प्रेम के नाज़ुक एहसासों की बातें इसके बस में न होगी या ये इसे व्यर्थ समझती होगी।
अक्सर ऐसी महिलाओं के लिए ये प्रेम का अर्थ वासना पूर्ती या फज़ूल की बातें ही समझने वाली होती हैं ।
हलाकि कई बार ऐसा भी देखा गया है कि ऐसी औरतें प्रेम के मामलें में बहुत चुप्पी और गहरी होती हैं। ये दिल ही दिल में किसी को बहुत गहराई से महसूसने और चाहने लगती हैं पर अपना प्रेम आसानी से उस व्यक्ति पे भी प्रकट नहीं करती हैं, न बातों से न हाव भाव से हाँ अपने प्रेमी के मिलने जुलने पर या घर आने जाने पे उसका खयाल कुछ ज़्यादा शिद्दत से करती हैं पर बहुत खुलती नहीं , ऐसे में कई बार उनका प्रेम अनकहा या इक तरफ़ा ही रह जाता है. और वे उदासी की एक और परत अपने चेहरे पे लगा लेती हैं और अपनी इस भावना पे ध्रण हो जाती हैं कि प्रेम एक बेकार की बात है।
खैर लम्बी भूमिका न बनाते हुए कहानी की नायिका पे आता हूँ, जिससे पहले पहल मिलने पर मुझे भी ऐसा ही लगा और ये बात कई कई मुलाकातों के बाद और निश्चित होती गयी। पर पता नहीं क्यों सांवली किन्तु आकर्षक सी चेहरे मोहरे वाली को देख के ऐसा लगता रहा जैसे रेत के नीचे नीचे मीठे मीठे जल की कोइ नहर हौले हौले ज़रूर बह रही है बस ज़रुरत है सतत खोदते और खोजते रहने की।
कई बार लम्बी बातों के दौरान कुछ कुछ थाह मिलती नज़र आयी पर फिर निराशा ही हाथ लगी।
पर बिना निराश हुए रेत् के भीतर बहती नदी की तलाश में लगा रहा।
उसके ठन्डे जिस्म को बिना हाथ लगाए उसके आस पास जमी रेत् को उलीचते हुए उसकी यादों के कुछ घोंघे, कुछ सीपियाँ, कुछ चमकते पत्थर और कुछ नर्म रेत् हाथ लगी जिन्हे शब्दों की उँगलियों से कुछ आकार देने की कोशिश की है,
पहला रेखा चित्र --
सुमन, यही नाम है उसका पाँच बहनो और चार भाइयों के लम्बी चौड़ी तादात में दुसरे नंबर की बहन का। इसे अपने रंग और भाग्य की तरह अपना नाम भी कभी पसंद नहीं आया। पर अपने रंग और भाग्य की तरह उसे अपना नाम भी जीवन भर ढोना पड़ रहा है, उसकी उदासी में एक बहुत बड़ी वजह मुझे ये भी दिखी, जो उसकी बातों से ही पता लगी। हालांकि मैंने उसे लीगल तरीके से नाम चेंज करवाने का सलाह भी दिया पर उसने मुँह बिचका के जला भुना जवाब दिया "नाम बदल लेने से भाग्य तो नहीं बदल जाएगा "
जो घटना मै बताना चाह रहा हूँ वो उसके जीवन में प्रेम को लेकर उसके मन में एक उदासी ,डर और उदासीनता पैदा करने वाली पहली घटना लगती है।
घटना के वक़्त सुमन जो उस वक़्त से बमुश्किल दस साल की पतली दुबली साँवली सी और अक्सर नक् बहनी सी लड़की थी , जो अक्सर अपने छोटे भाई बहनो की सेवा में लगी रहती थी वजह माता बच्चे पैदा करते करते हीमोग्लोबीन की कमी से मरी मरी रहती और जो भी ताकत बची होती वो ढेर सारे बच्चों के भोजन पानी में ही लग जाती लिहाज़ा हुए हुए बच्चों और होने वाले बच्चों की तामीरदारी सुमन और उसकी बड़ी बहन पुष्पा के ही जिम्मे होती।
खैर सरकारी स्कूल की पढ़ाई घर के काम काज और घर की किच -किच के बीच न जाने कब सुमन की बड़ी बहन की आँख पड़ोस के लड़के से लग गयी।
एक दिन जब वो उसके साथ छत पे बतिया रही थी तो न जाने कब वो किसी पड़ोसी के द्वारा देख ली गयी और ये शिकायत पिता जी तक पहुंच गयी।
परिणाम - गुस्सैल और कड़क पिता जी के कोपभाजन का शिकार पुष्पा जी हुई - ढेर सारी लात घूंसे और बाल नोचने के बाद की घंटो बाथरूम पे बंद कर दिया गया था। सुमन को बहुत कुछ समझ में नहीं आया ये ज़रूर समझ में आया प्यार वगैरह का कुछ लफड़ा था। सभी बच्चे डरे सहमे कई दिनों तक एक दुसरे से बात करते हुए भी डरते रहे।
मामला यही पे आ के नहीं रुका - मात्र साढ़े पंद्रह साल की उम्र में दूर की रिस्तेदारी में एक लड़का देख के पुष्पा दीदी की शादी कर दी गयी।
हलाकि माँ ने दबे जबान में बहुत समझने की कोशिश की की कम से कम दो साल तो रुक जाओ पर कड़क पिता अपनी इज़्ज़त को बचाये रखने के लिए किसी तरह रुकने को तैयार न हुए।
इस तरह सुमन जी की दीदी पुष्पा जी की पहली मुहब्बत खिलने के पहले ही मुरझा गयी और सुमन जी के दिल में मुहब्बत के फूल क्या बीज भी शायद सदा सदा के लिए नष्ट हो गए।
शायद सुमन जी की उदासी का ये पहला कारण था।
ऐसा मुझे लगा - आगे की कथा अगले अंक में
मुकेश इलाहाबादी -----------------
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