मैंने रात की पेशानी पर
धीमे से लिख दिया है,
सुकून पर एतराज़ कायम है।
यह जो ठहरा हुआ पानी है,
जिसमें कोई लहर नहीं उठती,
कोई पत्थर गिरकर
हलचल नहीं करता,
मुझे इस सुकून से शिकायत है।
क्योंकि जहाँ सब कुछ थम जाए,
वहाँ रूह की परवाज़ भी
कहीं खो जाती है।
लोग कहते हैं,
आराम में रहो,
बेख़ौफ़ जियो,
दिल को आदत डालो
सीधी, सुरक्षित राहों की।
मगर दिल
हर सीधी राह से ऊब जाता है।
उसे मोड़ चाहिए,
कुछ ख़तरा,
कुछ अनकहा,
कुछ ऐसा
जो नींद की तह में
हल्की सी बेचैनी रख दे।
मैंने देखा है,
सुकून अक्सर
ख़्वाबों की कीमत पर मिलता है।
और मैं
हर सौदा मंज़ूर नहीं करता।
हाँ, थकान के बाद
एक लम्हे का ठहराव अच्छा है,
मगर उम्र भर का सुकून,
यह तो रूह की सरहदें बाँध देता है।
इसलिए
मैंने एतराज़ दर्ज रखा है।
कि ज़िंदगी सिर्फ़ आराम नहीं,
थोड़ी सी आग भी है,
थोड़ी सी तलब,
थोड़ी सी रवानगी।
अगर दिल कभी
बेचैन होकर धड़के,
तो समझना,
यह शिकवा नहीं,
यह ज़िंदा होने की दलील है।
सुकून पर एतराज़
दरअसल
ज़िंदगी के हक़ में बयान है।
और जब तक
धड़कनों में हरारत है,
यह एतराज़
कायम रहेगा।
मुक़ेश,,,,,,,,,,,,
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