“रति की अवस्थाएँ : कामसूत्र से समाधि तक”
को आध्यात्मिक-काव्यात्मक शृंखला में प्रस्तुत किया गया है
जहाँ रति शरीर से आरंभ होकर
चेतना में विलीन होती है।
1. कुतूहल — रति का बीज
यह रति नहीं,
उससे पहले की
कंपन है—
जब किसी की उपस्थिति
मन को
जाग्रत कर देती है।
यहाँ देह नहीं हिलती,
केवल
चेतना
झुककर देखती है।
2. आकर्षण — देह की स्वीकृति
अब आँखें
रुकने लगी हैं,
और देह
मन की बात
मानने लगी है।
यह रति का
प्रवेश द्वार है—
जहाँ प्रकृति
अपना हाथ
आगे बढ़ाती है।
3. स्पर्श — ऊर्जा का प्रवाह
यहाँ स्पर्श
केवल त्वचा नहीं,
नाड़ी को छूता है।
इड़ा और पिंगला
धीरे-धीरे
एक लय में आती हैं,
और रति
ऊर्जा बन जाती है।
4. आलिंगन — अहं का ढीला पड़ना
जब देह
देह से मिलती है,
तो “मैं”
थोड़ा-सा
छूट जाता है।
यहाँ रति
स्वामित्व नहीं,
सहारा है।
5. तन्मयता — समय का विस्मरण
अब घड़ी
अर्थहीन है,
और विचार
चुप हो जाते हैं।
यह रति का
मध्य बिंदु है—
जहाँ
मन पहली बार
विश्राम करता है।
6. विस्फोट नहीं, विलय
यह चरम नहीं,
समर्पण है।
यहाँ सुख
चीखता नहीं,
मौन हो जाता है—
और देह
ऊर्जा में
घुलने लगती है।
7. शून्यता — समाधि का द्वार
क्षण भर के लिए
कुछ भी नहीं रहता—
न चाह,
न नाम,
न देह।
कामसूत्र
यहीं चुप हो जाता है,
क्योंकि
अब शब्द
पर्याप्त नहीं।
8. साक्षी भाव — रति से परे
अब जो है,
वह रति नहीं,
उसका
बोध है।
आनंद
अनुभव नहीं,
स्थिति बन जाता है—
और प्रेम
शांत हो जाता है।
9. समाधि — प्रेम की पूर्णावस्था
यहाँ न पुरुष है,
न स्त्री,
न मिलन।
केवल
एक चेतना
स्वयं में
स्थित।
रति
यहाँ पहुँचकर
प्रार्थना बन जाती है—
और समाधि
उसकी
मौन मुस्कान।
समापन दृष्टि
कामसूत्र
रति को
जीने की कला सिखाता है,
और समाधि
उसे
छोड़ देने की
प्रज्ञा।
जहाँ काम
जागृति बने,
वहीं
मोक्ष
दूर नहीं रहता।
मुकेश ,,,,,,,,,
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