पूर्णिमा के बाद की पहली रात — घटता उजाला और तुम
पूर्णिमा बीत चुकी है,
पर रोशनी अभी शेष है।
चाँद की गोलाई में
एक महीन-सी कमी उतर आई है—
जैसे संतोष ने
अहंकार को छूकर थोड़ा कम कर दिया हो।
तुम भी अब
मेरे भीतर उत्सव नहीं,
अनुभव हो।
चमक थोड़ी धीमी,
पर अर्थ अधिक गहरा।
दूसरी रात — क्षय में करुणा
चाँद अब थोड़ा और घटा है।
उजाला कम है,
पर अधिक कोमल।
जैसे प्रेम ने
अपने स्वर को धीमा कर लिया हो।
तुम्हारी आँखों में
अब चकाचौंध नहीं,
करुणा है।
घटता चाँद सिखाता है
पूर्णता स्थायी नहीं,
पर अनुभव शाश्वत है।
तीसरी रात — मौन की वापसी
अब रोशनी स्पष्ट रूप से कम हो रही है।
आकाश में अँधेरा लौट रहा है,
पर भय नहीं लाता।
क्योंकि एक बार जो उजाला देखा गया हो,
वह भीतर दीप बन जाता है।
तुम भी अब
मेरे पास नहीं,
मेरे भीतर हो।
चतुर्थ से दशमी तक — विरक्ति का विस्तार
रातें गहरी होती जाती हैं।
चाँद क्षीण,
पर गंभीर।
अब उसका प्रकाश
आकर्षण नहीं,
आत्मचिंतन है।
तुम्हारा होना भी
अब लहर नहीं,
स्मृति की शांत धारा है।
हम दोनों सीख रहे हैं
प्रेम का अर्थ पकड़ना नहीं,
छोड़ना भी है।
एकादशी से चतुर्दशी — अंतिम रेखा
चाँद अब एक पतली चाँदी की रेखा है।
इतना कम कि
लगभग अदृश्य।
पर उसकी वही पतली रेखा
सबसे अधिक पवित्र लगती है।
जैसे प्रेम का अंतिम स्पर्श
जिसमें आग्रह नहीं,
केवल आशीर्वाद है।
अमावस्या — पुनः अदृश्यता
और फिर—
चाँद अदृश्य।
पर इस बार
अमावस अंधेरी नहीं लगती।
क्योंकि पूर्णिमा का उजाला
अब भीतर जन्म ले चुका है।
तुम भी अब
न सामने हो,
न दूर
बस मेरी चेतना में विलीन।
अमावस्या की यह रात
खाली नहीं,
पूर्ण चक्र का मौन है।
मुकेश ,,,,,,,,,
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