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Thursday, 19 February 2026

रेत् के नीचे नदी ,,,, भाग सात

 रेत् के नीचे नदी ,,,, भाग सात

(ये दृश्य कब का है यह तो याद नहीं पर आप इसे कहानी और उसके पात्रों के हिसाब से किसी भी दिन का मान सकते हैं,या समझ सकते हैं  )

(कहानी के दोनों पात्र दरिया किनारे बैठे हैं - नाईका ने अपने दोनों पैर (जो रोएँ रहित और चिकने हैं ) दरिया के पानी में डुबो रखे हैं। 

जबकि  कहानी का सूत्रधार  एक पैर पानी में और दूसरा पैर मोड़ एक पैर की पालथी लगा के बैठा है। 

दोनों चुप - देर से 

सूत्र धार नदी के जल में कंकरी फेंक - फेंक ऊब चूका है 

जब कि नाईका अभी भी आदतन चुप बैठी देख रही है

दूर - आसमान में उड़ता एक पंछी - अकेला 

दूर - आसमान में डूबता सूरज - अकेला 

सूत्रधार ने इस गाढ़े मौन को तोड़ने, कुछ संवाद बनाए रखने की गरज़ से बात शुरू की )

-सुनो 

- हूँ 

- एक बात बोलूँ ?

- हूँ 

- तुममे और यमुना नदी में बहुत समानता है 

- कैसे ?

- यमुना भी गहरी है - और तुम्हारी आँखे भी 

- और (ऊपर से शांत अंदर से गुदगुदी लिए हुए )

- यमुना सांवली है और तुम भी 

- और ,,,,

- यमुना के जल में एक चमक है और तुममे भी 

- हूँ तो ??

- तो क्या तुम भी अपना नाम यमी रख लो 

- क्युँ ??

- क्यों क्या। "यमी " बोलने और सुनने में भी अच्छा लगता है 

   और वैसे भी तुम्हे अपना "सुमन " नाम अच्छा नहीं लगता 

- हूँ 

- हूँ क्या तो आज से मै तुम्हे इसी नाम से पुकारूँगा 

  तो ओ मेरी यमी - तुम कितनी अच्छी हो 

(यमी के चेहरे पे हँसी पर बात में गंभीरता का पुट )

- तुम कवी लोग भी न पता नहीं क्या क्या सोचते रहते हैं 

- ओह ! मैंने कुछ गलत बोला क्या ??

- गलत तो नहीं पर तुम्हारे पास इन सब बातों के अलावा और कोइ बात नहीं रहती है क्या 

-बातें तो बहुत सी रहती हैं, पर तुम्हारे पास वक़्त हो तब न 

- हूँ तो बोलो 

- (सूत्रधार के चेहरे पे हल्की शरारत और मौका देख के कुछ जानने की गरज़ से ) एक बात और पूछूँ 

- पूछो  (नाइका ने अपने सलोने पैरों से नदी के जल को हिलोरा देते हुए )

- मन न हो तो न पूछूँ 

- अब पूछ ही लो, वैसे भी तुम बिन पूछे तो रहोगे नहीं ( गालों पे गिर आई लट को संवारते हुए )

- तुम्हे कभी कोइ बहुत बहुत अच्छा लगा है ? मेरा मतलब बिलकुल ख़ास ?

- हूँ ये भी कोइ पूछने की बात है ?? हर किसी को कभी न कभी कोइ न कोइ अच्छा लगता ही है 

- वाओ ! वो कौन खुश नसीब था ? जान सकता हूँ अगर मन हो तो शेयर कर सकती हो 

- नहीं (सपाट जवाब )

- ओह क्यों ? क्या मुझपे तुम्हे विश्वास नहीं या मै इस लायक नहीं कि तुम कुछ पर्सनल चीज़ें शेयर कर सको 

- बात विश्वास की नहीं 

- फिर ??

- बस ऐसे ही- बहुत सी बातें शेयर करने वाली नहीं होती हैं 

   वैसे भी लड़कियों से ये सब नहीं पूछते 

- (सूत्रधार कुछ उदास हो जाता है - पर संयत स्वर में )ठीक, जैसी तुम्हारी मर्ज़ी 

 कुछ देर सन्नाटा 

- हूँ - नाराज़ हो ?

- नहीं 

- गुड बॉय आओ वापस चलते हैं - बहुत देर हो चुकी है (नाइका मुस्कुराते हुए - आदत के विपरीत रिएक्शन )

- हूँ चलो - अब कब मिलोगी मेरी यमी (हँसते हुए )

- पता नहीं 

- ओके ,,,चलो ,,

दो छायाएँ शाम के झुटपुटे में हौले हौले सरस्वती घाट से यमुना के किनारे पैदल ही गऊ घाट की तरफ 

जा रही हैं और फिर अपनी अपनी दिशा में मुड़ जाती हैं - बहुत दूर जा के 

उधर शाम के अंधियारे में यमुना बह रही थी मंथर गति से 

और इसी दिन से मेरी नाइका अपने ओरिजिनल नाम से बदल के "यमी हो चुकी थी 

(लिहाज़ा अब से कहानी में ज़रुरत पड़ने पर मै नाईका को "यमी " हे कह कर सम्बोधित करूँगा हाँ इस घटना के बाद नाइका यानी की सुमन या कह सकते हो सूत्रधार की यमी ने सूत्र धार को अपने कोमल एहसासों के बारे में टुकड़े टुकड़े में बहुत सी बातें बताईं - जिन्हे जोड़ कर घटनाओं का एक कोलाज़ बनता है - जिसे कहानी की तरह आप के सामने लाने की कोशिश करूंगा )

मुकेश इलाहाबादी -

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