रेत् के नीचे नदी -- (भाग छह )
नदी
अपने किशोर अवस्था में थी
वो अपने उद्गम से अभी अभी निकली ही निकली है
वो भी किसी पहाड़ी नदी की तरह
उछलना और मचलना चाहती थी
अपनी लहरों को ऊँचे और ऊँचे उछाल के खिलखिलाना चाहती थी
नदी अपनी तरह से बहना और मचलना चाहती थी
और वो सारे तट बंधन से मुक्त हो बहना चाहती थी
बहना और सिर्फ बहना उसका स्वाभाव था
और चाहत भी
तब उसे नहीं पता था
नदी को लम्बी दूरी तय करने के लिए दो किनारों की सख्त ज़रुरत होती है
और समंदर जिसका गंतव्य होता है
खैर उस किशोरी नदी को यह सब क्या पता होता
वो तो अपनी इक्षित गति से बह भी नहीं पा रही थी
उसे तो अपनी परिस्तिथियों के कठोर तटबंधों के मध्य बहते जाना था
और वो मंद और मंथर गति से बह रही थी
जी हाँ ! अपने सही समझा मै बात अपनी कहानी की
सजीली सलोनी और सांवली नाइका की बात कर रहा हूँ
जो वक़्त के साथ साथ सुगठित देहयष्टि की स्वामिनी के साथ साथ
गहरी और आकर्षक व मोह लेने वाली आँखों की मालकिन भी हो चुकी है
उसको देख अक्सर लोगों को महसूस होता जैसे
सांवली और गहरी यमुना बह रही हो प्रयाग के घाटों के बीच
जिसमे कितना भी बाढ़ का जल आ जाए
पर जो गंगा की तरह उफनाती नहीं बल्कि
अपने शांत और सौम्य तरीके से बहती ही रहती है
अपने नैसर्गिक सौंदर्य के साथ साथ
पर नाइका जो बाहर से एक ही तरह से बह रही है
घर की जिम्मेदारियों और पढ़ाई के बीच
पर अंदर ही अंदर कई कई रास्ते उसे अपनी अपनी तरफ खींच और लुभा रहे हैं
जैसे एक मन कहता
चल प्रेम डागरिया चल हौले हौले उफन और हमजोलियों की तरह
एक मन कहता है - नहीं उधर मत बह
बहना है तो बह - पढ़ाई और कॅरिअर की तरफ
तो एक कहता है - बहुत पढ़ पढ़ के क्या होगा करना तो चौका चूल्हा है
तो थोड़ा बहुत पढ़ और शादी शूदी कर के आराम से रहना
पर एक मन कहता है - नहीं जीवन में कुछ तो ऐसा करो जो लोग याद करें
मान करें, सम्मान करें
और नदी यानी नाईका इसी उधेड़ बुन में घर का चौका चूल्हा कर रही है
इसी उधेड़ बन में इतिहास भूगोल और नागरिकशास्त्र के चैप्टर याद कर रही है
इसी उधेड़ बुन में सहलियों संग लड़कियों वाले खेल भी खेल लेती है
गर्मी की रात में छत पे या सर्द रातों में बिनाका गीत माला और छाया गीत में
कुछ रूमानी गाने सुन के खुद को बहला लेती है
और फिर सुबह उठ के अपनी रूटीन में लग जाती है
और एक नदी की तरह बहने लगती है - मंथर गति से
(खैर इस एपिसोड में तो कोइ घटना नहीं हुई पर अगले एपिसोड में हम नाइका के कुछ अंतर्मन के कोमल एहसासों को पढ़ने की कोशिश करेंगे )
मुकेश इलाहाबादी -----
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