रेत् की नीचे नदी, (भाग पाँच)
कहने को तो मैं इस नाईका प्रधान कहानी का सूत्र धार हूँ, पर मेरे और नाईका के बीच बहुत उलझाव हैं, बात इतनी सीधी नहीं है कि मैं एक सिरा पकड़ूँ और कहानी को आगे बढ़ाता चला जाऊँ अपनी मर्ज़ी से।
मुझे कहानी नाईका की मर्ज़ी से ही बढ़ानी पड़ रही है,
हालांकि नाईका नखरीली नहीं है फिर भी बहुत कुछ उसके मूड और सुविधा के अनुसार ले के चलना पड़ता है।
अगर वह व्यस्त है, तो कहानी रुक जाती है
अगर वह बीमार है, तो कहानी रुक-सी जाती है
अगर वह अपने अकेलेपन से ऊब-ऊब के फिर-फिर अकेलेपन में डूब जाना चाहती है तो-कहानी रुक जाती है
ऐसा ही कुछ इस बार भी हुआ,
हुआ यूँ की वह अपने सिर दर्द का बहाना ले कर गयी तो फिर कई दिन तक चुप्पी की डुप्पी लगाए रही,
एक दो बार कहानी का सिरा पकड़ने की कोशिश भी की तो नकमियाबी हासिल हुई.
ओह! आप लोग सोच रहे होने मैं भूमिका बहुत लम्बी बानाता हूँ, तो मित्रो बात भूमिका लम्बी बनाने की नहीं है
दरअसल बात ये है कि भूमिका के माध्यम से मैं कहानी में नाईका के मनोभावों आदतों और सोच को भी बताते चलने की कोशिश करता हूँ
वैसे भी अगर कहानी में सिर्फ़ घटनाएँ ही घटनाएँ बता दूँ तो कहानी समाचार पत्र या कोइ लेख बन के रह जाएगी जो मैं नहीं चाहता।
और शायद आप भी नहीं चाहेंगे।
खैर, उस दिन के बाद कल बात हुई और कहानी का सिरा भी कुछ-कुछ वहीं से शुरू हुआ।
नाईका वक़्त के साथ-साथ बडी होती जा रही है,
और बड़ी होती जा रही हैं उसकी सामान्य किंतु आकर्षक और गहरी और मन को बाँध लेने वाली आँखे,
और नुकीली होती जा रही हैं उसकी काली, गझिन व नुकीली पलकें,
बढ़ती जा रही है उसकी साँवली और इकहरी देह यष्टि जो न तो देखने में दुबली है और न मोटी,
साधारण और ढीले ढाले स्कूल के यूनिफॉर्म में भी एक सलीके से बढ़ती जा रही हैं नाइका, अपनी सहज और सौम्य सुंदरता के साथ-साथ
और बढती जा रही है
उसकी लम्बाई, जिस्म की गोलाइयाँ
और कमज़ोर कंधो पर जिम्मेदारियों का बोझ
माँ बीमार है (जो अक्सर होता है) तो सुबह उठते ही
तो अपने लिए और घर भर के लिए सुबह स्कूल जाने के पहले नास्ता बनाना है
लौट के घर की साफ़ सफ़ाई करना है।
आने जाने वाले रिश्तेदारों को भी देखना है, उनकी चाय और नास्ते से तामीरदारी भी करनी है
रात बिरात् पिता ड्यूटी से थक के आये हैं तो पिता के लिए खाने पीने की व्यवस्था करना है,
उनके सिरहाने पानी का ग्लास रखना है
उनका चस्मा मफलर और टोपी भी ऑफिस जाते वक़्त देना है
पिताजी को गुस्सा आ जये तो वह भी सम्भालना है।
ऐसे में घर के छोटे से छोटे काम से लेकर बडे से बड़े काम भी न जाने कब और कैसे उसके जिम्मे आ गए पता ही न लगा।
जब तक पता लगता तब तक तो बहुत देर हो चुकी थी, खैर फ़िल्हाल उसी बात पर आते हैं,
रात सब लोग घर आ जाएँ तो मेन गेट में ताला लगाना है तो नाईका ही लगाए,
दूध वाला आया तो उसे ले कर गर्म करना तो नाईक ही करे
किसी बहन का कोई इमोशनल या पर्सनल प्रॉब्लम हो तो उसक भी टेक केअर करना है तो नाईका ही करे
छोटे भाई बहनो को होमवर्क में दिक्कत तो उसे भी ये नाईका ही सॉल्व कराये,
यहाँ तक कि
कई बार तो घर के बाहर के कामो की ज़िम्मेदारियों को भी नाईका ही निभाए,
चाहे वह सब्जी लाना हो या फिर बनिया के यहाँ से धनिया और मिर्च लाना हो,
अगर भाई या बहनों में से किसी ने कर भी दिया तो एहसान की तरह या मन मार के किया
वैसे भी एक बड़े भाई उन्होंने अपने से काम कर दिया तो ठीक वरना अपनी पढाई का बहाना बना चुप मार जाते हैं
वैसे भी वह माता जी और पिता जी की आँख के तारे जो हैं
उनकी पढ़ाई और सुविधा में कोइ कमी न होनी चाहिए,
हलाकि नाइका ख़ुद बड़े भाई का सम्मान करती है और वह भी अपनी इस बहन को मानते हैं पर काम और पढ़ाई के मामले में नो समझौता
रही दूसरी बहने या तो बहुत छोटी या फिर वे ऐसी छुई मुई-सी बन गई है जिन्हे अगर बाहर भेजा जाए तो वे तो शर्म से ज़मीं में गड जाएंगी, या कोई लफंगा छेड़ जाएगा।
ऐसे में सिर्फ़ और सिर्फ़ हमारी कहानी की नाइका ही बचती थी जो इतनी मज़बूत थी की काम करते-करते थकती नहीं है।
जिसे बाहर निकलने में न तो दिक़्क़त होती न कोई लफंगे को छेड़ने का डर होता है।
(शायद वह और बहनो की तरह उतनी गोरी नहीं और या उतनी सुंदर और नाज़ुक नहीं है या उन सब से मज़बूत और दबंग है)
खैर, नाइका भी पता नहीं किस मिट्टी की बन के आई है जो हर काम हर परिस्तिथि में अपने आप को न केवळ घुलने और टुटने से बचाए रखा बल्कि ख़ुद को एक ऐसे रूप में ढाला जिसमे,
अनुभव, दर्द, मेहनत घुल मिल के अलग ही चमक और खूबसूरती नज़र आती है, जिसके आकर्षण से निकलना आसान नहीं है,
ऐसे मे नाइका जो अपनी प्रकृति के अनुसार बहिर्मुखी हो कर भी अंतर्मुखी होती जा रही है।
ये अंतर्मुखता और परिस्तिथियों की कठोरता उसके व्यक्तित्व को निखारने लगे जिसका आकर्षण उम्र के साथ-साथ बढ़ता ही गया
जो तपे हुए सोने की तरह से उसके साँवले सजीले चेहरे पर आज भी दीखता है।
और शायद वही आकर्षण और चमक है जो मेरी लेखनी में कहानी बन के उतरती जा रही है।
धीरे - धीरे
एक नदी की तरह
नदी जो बह रही है
रेत् की नीचे-नीचे
हौले - हौले,
मध्यम – मध्यम
मित्रों, नाइका के टीन एज और उसके कुछ आगे की उम्र के कुछ नाज़ुक एहसासों की चर्चा अगली बार करेंगे
मुकेश इलाहाबादी ,,,,,,,,,,,,,,,
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