रेत के नीचे नदी,, चतुर्थ भाग,,,
जब कभी कहानी की नायिका के बारे मे सोचता हूँ, तो जाने क्यूँ ऐसा लगता है, मानो मै नदी की तलाश मे रेत को उलीच रहा हूँ, जिसमे पानी की जगह सिर्फ रेत ही रेत है, जिसे उलीच कर मै न केवल अपना वक़्त बर्बाद कर रहा हूँ बल्कि अपनी उंगलियाँ और नाखून भी लहू लूहान कर ले रहा हूँ।
कई बार तो उसकी ओर से उपजी उदासीनता और संवाद हीनता हवा के झोंके सा आँखों मे किरकिरी बन दर्द देते रहते हैं। देर तक।
पर मै भी अजब ज़िद्दी,
रेत के नीचे गुम न जाने किस नदी की तलाश मे फिर- फिर रातों मे बर्फ सी ठंडी, दिन मे बेहद तपती रेत को उलीचने लगता हूँ,
फिर -फिर, दरसल हुआ यूँ कि उस दिन के बात के बाद, न तो उसका कोई फोन आया और न ही मेरे किसी मेसेज का जवाब ।
एक बार फिर हिम्मत कर के मेसेज करता हूँ।
-हैलो
- हाय
- कैसे हो?
-ठीक (ठंडा सा जवाब)
- फ्री हो?
- हाँ
- काल करूँ?
-जी करिये
वेट,,,
वार्ता लाप्,,,,
- कैसे हो?
-कुछ खास ठीक नही
-क्यूँ?
-कई दिनों से माईग्रेन् का दर्द फिर से होने लगा, बुखार भी है
- ओह, दवाई ली? तुमने बताया भी नही
-तबियत ठीक नही होती तो किसी से बात करने का मन नही होता,
(मन तो हुआ पूछूँ मै भी किसी मे हूँ क्या, पर मौका ठीक नही था, लिहाज़ा चुप रह गया)
-हं, अब कैसी है तबियत? कुछ बेहतर
- गुड़, तो आराम करो जब ठीक हो जाओ तो मेसेज करना
-जी आप को कल रात फोन करूँगी, अभी भाई और तीसरे नंबर वाली बहन भी आई है, दो दिन से।
-ओ के टेक केअर,,
-बाय
(दिल को कुछ सुकूँ मिला, नाइका ने इग्नोर नही किया है, मन ही मन खुश हुआ)
फिल्हाल वो साँवली अपनी डी पी मे वो अपनी हल्की हल्की मुस्कुराहट मे बेहद प्यारी लग रही थी, शिवानी की कृष्ण कली से भी ज्यादा खूबसूरत,,
जिसके सीने मे एक मीठी नदी बहती है हौले हौले।
मुकेश इलाहाबादी
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