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Friday, 20 February 2026

छतों पर सूखती हुई बारिश

छतों पर सूखती हुई बारिश

आज धूप की उँगलियों में अटकी रही

जैसे किसी ने

भीगे हुए दिन को

कपड़े की तरह फैलाकर टाँग दिया हो।


टीन की छतों पर

अब भी उसकी थाप की याद है,

सीमेंट की दरारों में

बूँदों का अधूरा संगीत सोया है।


कल रात

वह बादलों की बाँहों से उतरकर

शहर की गर्दन पर बिखर गई थी

गली के मोड़ पर

कीचड़ ने पहला आईना बनाया,

और बच्चों ने

छपाक में अपनी हँसी छोड़ दी।


अब वही बारिश

धूप की तपिश में

धीरे-धीरे हल्की हो रही है

जैसे कोई ख़त

जिसकी स्याही

आँखों की नमी से धुल गई हो।


छतों पर

कपड़ों के साथ

कुछ अधूरे ख़्वाब भी सूख रहे हैं,

किसी ने बाल्टी उलटी कर दी है,

किसी ने आसमान को

फिर से तह कर लिया है।


मगर पानी की वह महक

अब भी हवा में तैरती है

मिट्टी की देह से उठती हुई,

याद की तरह गीली।


बारिश कभी पूरी नहीं सूखती,

वह थोड़ी-सी रह जाती है

ईंटों के भीतर,

दिलों की दीवारों पर,

और उस कोने में

जहाँ हम भीग कर चुप हो जाते हैं।


छतों पर सूखती हुई बारिश

दरअसल

समय का वह विराम है

जो हमें याद दिलाता है

कि हर भीगना

एक दिन धूप में बदलता है,

पर उसकी नमी

कहीं न कहीं

जीवन की नसों में

धीमे से बहती रहती है।


मुकेश ,,,,,,,,,,,

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