परछाइयों में पलता हुआ दिन
आज फिर दीवार की पीठ से लगा खड़ा था
धूप बाहर आँगन में फैली थी,
पर उसका उजाला
दरारों से छनकर भीतर आता था।
सुबह ने खिड़की खोली,
पर कमरे के कोनों में
रात की बची हुई स्याही
अब भी जमकर बैठी थी।
दिन का चेहरा
पूरी तरह उजला नहीं था
उस पर
पेड़ों की डालियों की लकीरें थीं,
इमारतों की लंबी उँगलियाँ थीं,
जो उसे टुकड़ों में बाँटती रहीं।
वह सीधे नहीं चलता,
दीवारों के सहारे बढ़ता है,
जैसे उसे
अपनी ही रोशनी से डर हो।
परछाइयाँ
उसके साथ-साथ चलती हैं
कभी आगे निकल जाती हैं,
कभी पीछे छूट जाती हैं,
मगर दिन
उन्हीं की गोद में बड़ा होता है।
बच्चा जब पहली बार
धूप में कदम रखता है,
तो उसके पीछे
एक काली रेखा जन्म लेती है
वही रेखा
उसे बताती है
कि उजाला अकेला नहीं आता।
दिन की सबसे तीखी किरण भी
किसी छाया को जन्म देती है,
और छाया
दिन को आकार देती है।
परछाइयों में पलता हुआ दिन
दरअसल
हमारी ही सच्चाई है
जहाँ उजाला और अँधेरा
एक-दूसरे की परवरिश करते हैं।
शाम होते-होते
दिन समझ जाता है
कि उसे डूबना नहीं,
बस लौटना है
ताकि अगली सुबह
फिर किसी परछाईं की गोद से
उग सके।
मुकेश ,,,,,,,
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