मैं ठहरना चाहता था,
पर समय
मेरे पीछे खड़ा रहा।
पहले
ज़रूरत में चला,
फिर
आदत में।
पीठ का पत्थर
हल्का नहीं हुआ,
मैं
संतुलित हो गया।
अब
चलना
मंज़िल नहीं,
स्वभाव है।
मुकेश ,,,,,,,,,,,
No comments:
Post a Comment