रीढ़
कोई आवाज़ नहीं करती,
वह
सहते हुए
आकार बनाती है।
उसकी ख़ामोशी में
कोई शिकायत नहीं,
सिर्फ़
खड़े रहने की
तालीम है।
जब पीठ पर
पत्थर रखा जाता है,
रीढ़
रोती नहीं
वह
सीधी हो जाती है।
समय
उसके ऊपर से
गुज़रता है,
और वह
हर क्षण
थोड़ी और
ध्यानमग्न होती जाती है।
रीढ़ जानती है
झुकना भी
एक भाषा है,
और न झुकना
एक मौन प्रतिज्ञा।
इसीलिए
जब सब टूटते हैं,
रीढ़
ख़ामोश रहती है
क्योंकि
आध्यात्म
शोर नहीं करता,
वह
संरचना रचता है।
और अंत में
मनुष्य
सीधा नहीं खड़ा होता,
वह
अपनी ख़ामोशी पर
टिका होता है।
मुकेश ,,,,,
No comments:
Post a Comment