प्रेम,
कभी नियमों की किताब नहीं पढ़ता,
न उसे परंपराओं से मतलब होता है,
न समाज की चौखटों से।
वो तो हवा की तरह आता है
बिना दस्तक, बिना वजह,
और मन के भीतर
अपना घर बना लेता है।
वो किसी मंज़िल का यात्री नहीं होता,
न किसी परिणाम की चिंता करता है।
उसे बस चलना आता है,
उसकी हर सांस में एक पागलपन होता है
जो कहता है,
“या तो पा लो मुझे,
या खोकर भी मेरा हिस्सा बने रहो।”
प्रेम को कोई नाम नहीं चाहिए,
वो रिश्तों की परिभाषा से परे है।
वो जानता है,
कि नाम मिलते ही सीमाएँ बन जाती हैं,
और सीमाएँ बनते ही प्रेम मरने लगता है।
इसलिए वो नाम से भागता है,
पर एहसास में ठहर जाता है
किसी स्पर्श, किसी नज़र,
किसी चुप्पी में बदलकर।
प्रेम जब आता है
तो किसी दर्पण में खुद को देखता नहीं,
वो देखता है — सामने वाले की आँखें।
वहीं उसे अपना वजूद मिलता है।
वो जानता है कि
“मेरा होना तुम्हारे भीतर है।”
और जब चला जाता है,
तो पीछे कुछ नहीं छोड़ता
सिवाय उस आहट के
जो रातों को धीमे से कहती है
“मैं यहीं हूँ, बस रूप बदल गया हूँ।”
प्रेम,
कभी टिकता नहीं
क्योंकि उसे बहना पसंद है।
कभी सागर बनता है
अथाह, अनंत, सब कुछ निगलता हुआ,
तो कभी ओस की बूँद
जो सूरज की पहली किरण में
खुद को मिटा देती है,
सिर्फ इसलिए कि उस प्रकाश का हिस्सा बन सके
जिससे वो प्रेम करता है।
वो न पाने में हार मानता है,
न खोने में रोता है।
क्योंकि उसके लिए
दोनों ही स्थिति एक सी हैं
एक में मिलन है,
दूसरे में विलय।
प्रेम कभी समाप्त नहीं होता,
वो तो बस रूप बदलता है
कभी सांस बनकर,
कभी स्मृति बनकर,
कभी एक कविता बनकर,
जिसे तुम पढ़ते हो
और तुम्हारा हृदय कहता है
“हाँ, यही तो है प्रेम।”
प्रेम कभी जीतना नहीं चाहता,
वो बस होना चाहता है
जैसे अस्तित्व स्वयं प्रेम हो।
और जब वो मिट जाता है,
तो भी पीछे नहीं जाता,
बस कहीं भीतर रोशनी छोड़ जाता है
जो तुम्हें जीवनभर जलाती रहती है,
धीरे,
सुंदरता से,
निस्वार्थ।
मुकेश्,,,
No comments:
Post a Comment