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Wednesday, 18 February 2026

अग्नि — वेद की पहली आवाज़

  "अग्नि — वेद की पहली आवाज़"


(ऋग्वैदिक चेतना की आधुनिक व्याख्या)

मूल मन्त्र :

अग्निमीळे पुरोहितं यज्ञस्य देवमृत्विजम् ।

होतारं रत्नधातमम् ॥


 शाब्दिक अर्थ :

मैं अग्नि की स्तुति करता हूँ —

जो यज्ञ का पुरोहित है, देवताओं का ऋत्विज है,

और जो रत्नों (समृद्धि, प्रकाश, ऊर्जा) का दाता है।

 दार्शनिक और मनोवैज्ञानिक व्याख्या :

“अग्नि” यहाँ केवल भौतिक आग नहीं है।

यह चेतना की प्रथम कंपन, कुंडलिनी की आरम्भिक लहर,

और विवेक का प्रथम प्रकाश है।

वेद का यह पहला मन्त्र ब्रह्माण्डीय उत्पत्ति का प्रतीक है —

जब कुछ नहीं था, तब ऊर्जा की पहली तरंग फूटी,

जिसे ऋषि ने “अग्नि” कहा।

मानव शरीर में वही तरंग “मूलाधार की अग्नि” है —

जो ऊपर उठते हुए आत्मा को “यज्ञ” बना देती है।


 नज़्म : “अग्नि — जो भीतर जलती है”


अग्नि,

तू वेद की पहली आवाज़ है,

पहली साँस,

पहली चमक,

जिसने अँधेरे को बताया —

कि मैं हूँ।

(यहाँ “अँधेरा” अज्ञान है, और “मैं हूँ” आत्म-प्रबोधन।)

तेरी जिह्वा से निकलीं ऋचाएँ,

तेरे ताप से पिघला पत्थर,

और जन्म लिया मनुष्य ने —

सोचने के लिए,

पूजने के लिए,

खोजने के लिए।

(यह पंक्ति ब्रह्माण्डीय क्रम से मनुष्य की चेतना तक की यात्रा है —

जहाँ अग्नि ने पत्थर से जीवन, और जीवन से बुद्धि जगाई।)

तू वही अग्नि है

जो गृहस्थ के चूल्हे में मुस्कुराती है,

और तपस्वी के हृदय में तप बन जाती है।

(यहाँ दो अवस्थाएँ हैं — लौकिक और आध्यात्मिक।

चूल्हे की अग्नि शरीर को पोषित करती है,

तप की अग्नि आत्मा को शुद्ध करती है।)

कभी तू रसोई की महक है,

कभी रणभूमि की गर्जना।

पर सत्य यही है —

तू जहाँ भी जलती है,

वहाँ जीवन साँस लेता है।

(अग्नि हर सृजन और संघर्ष दोनों का मूल है —

बिना अग्नि के न शक्ति है, न जीवन।)

तेरी लौ में ही

ऋषि ने पाया देवत्व,

कवि ने पाया शब्द,

और मनुष्य ने पाया स्वयं।

(यहाँ अग्नि = प्रेरणा।

ऋषि के लिए ध्यान की ज्वाला,

कवि के लिए कल्पना की लौ,

मनुष्य के लिए आत्म-बोध की दीप्ति।)

अग्नि —

तू नष्ट भी करती है,

पर तेरे बिना

सृजन भी नहीं।

(अग्नि दोधारी शक्ति है — विनाश और पुनर्जन्म दोनों का प्रतीक।

यही ब्रह्माण्ड का संतुलन है — “रुद्र” और “सृजन” का एकत्व।)


मुकेश इलाहाबादी -


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