जाड़े में चिड़िया का एक दिन
एक --
जाड़े की
कोहरे वाली सुबह...
चिड़िया अभी भी
गर्म लिहाफ़ में
धीरे-धीरे साँस लेती हुई
सो रही होगी
करवट बदले हुए
बेहद मासूम सी,
अपनी कुहनी मोड़कर
उस पर सिर टिकाए,
सपनों की किसी
हल्की गुलाबी पगडंडी पर
खोई-खोई…
या फिर
नींद के गहरे आग़ोश में
यूं लिपटी हुई
मानो दुनिया से कहना चाहती हो—
“ज़रा ठहरो,
मैं अभी भी अपने भीतर
सुबह बुन रही हूँ।”
दो --
चिड़िया अब उठ चुकी है
नींद की मुलायम परतों को
पीछे छोड़कर
रविवार की ज़मीन पर
आहिस्ता-आहिस्ता उतर आई है।
वो अपने छोटे-छोटे
साप्ताहिक कामों में लग गई है—
कपड़े धोते हुए
झाग में उगती नन्ही-सी धूप को देखती है,
फिर उन्हें सुखाने के लिए
रस्सी पर टाँगते वक्त
हवा की हल्की थपकी महसूस करती है।
घर की सफ़ाई में
झाड़ू की लय
किसी पुराने गीत की तरह
कमरों में घूमती रहती है।
फिर उसे याद आता है
कुछ पुराने मित्र भी हैं
जिनके हाल पूछना
रविवार की परंपरा-सा है।
वो उनके नंबर मिलाती है,
हल्की हँसी में
कई महीनों की दूरी पिघलाती हुई।
शायद किसी से मिलने का
मूड भी बन जाए—
या फिर
बस बिस्तर पर लौटकर
आराम की उसी मीठी दुनिया में
लेट जाए,
जहाँ मोबाइल चलाने का
छोटा-सा सुख
किसी लंबी उड़ान से
कभी-कभी ज़्यादा प्यारा लगता है।
और मैं सोचता हूँ—
चिड़िया चाहे जिस काम में लगे,
उसकी दुनिया अभी भी
सुबह की धूप जैसी ताज़ा है,
और कहीं न कहीं
मेरे ख़याल की
एक पतली, अनकही डोर
उसके दिन के आसमान में
धीरे से थिरक रही है।
तीन —
अब दोपहर अपनी
धीमी, सुनहरी धूप फैलाने लगी है—
और चिड़िया
अपने कामों से थोड़ी थकी हुई
टेबल के किनारे बैठी
चाय की भाप में
आराम का एक छोटा-सा द्वार खोज रही है।
उसकी उंगलियाँ
कप की गर्माहट थामे रहती हैं,
और पंखों-सी हल्की हथेलियों पर
भाप ऐसे ठहरती है
मानो किसी ने उसे
दिनभर की मेहनत के बदले
एक नरम-सा पुरस्कार दे दिया हो।
वह खिड़की के बाहर देखकर
सोचती है—
रविवार के घंटे
कितने अलग होते हैं,
न कोई जल्दबाज़ी,
न कोई बंधन…
बस एक शांत-सी स्वतंत्रता
जो धीरे-धीरे पिघलती है
और कमरे की हवा में घुल जाती है।
कभी अचानक
वह पुराने एलबम के
किसी कोने में उतर जाती है
कभी किसी गीत में,
कभी किसी याद में,
कभी किसी भूले हुए चेहेरे में
अपनी मुस्कान का एक टुकड़ा
ढूँढ लेती है।
फिर अचानक
मोबाइल की स्क्रीन जगती है—
किसी मित्र का जवाब,
या किसी बातचीत की छोटी-सी लौ
जो फिर से मन को
हल्का-सा गर्म कर देती है।
और मैं…
मैं अपनी खिड़की से
उसका यह छोटा-सा रविवार देखता हूँ—
बोलकर नहीं,
बस महसूस करके।
उसके दिन की ताल
कभी झाड़ू की लय जैसी,
कभी दुपट्टे की उड़ान-सी,
कभी चाय की भाप जैसी
धीमी और कोमल…
और मेरे अंदर कहीं
एक अदृश्य-सी धुन
धीरे-धीरे गूँजती रहती है—
कि जाड़े की यह चिड़िया
चाहे जितनी साधारण लगती हो,
उसके हर छोटे काम में
एक अनकही कविता बसती है,
और मैं अनजाने में
उसकी रज़ामंदी के बिना ही
उस कविता का
सबसे मौन पाठक बन जाता हूँ।
चार ---
शाम अब ज़रा-सी
नीली होने लगी है—
उसी नीली में
एक हल्की-सी थकान
और थोड़ी-सी तसल्ली
मिलकर बैठ गई है।
चिड़िया ने
अपनी चाय ख़त्म कर ली है,
और अब वह
घर की खिड़की पर खड़ी होकर
दिन को धीरे-धीरे
ढलते हुए देख रही है
जैसे कोई अपने ही बनाए
रविवार के चित्र में
अंतिम रेखा खींच रहा हो।
उसके पंखों में
एक छोटा-सा सुकून है,
जैसे उसने
रोज़मर्रा के कामों के बीच भी
खुद को
थोड़ा-सा बचा लिया हो।
वह रसोई की ओर जाती है
न कोई खास पकवान,
बस किसी हल्की-सी भूख के लिए
कुछ साधारण-सा बनाती हुई,
और भाप में धीरे से
अपने दिन की कहानियाँ उबालती हुई।
फिर वह
लिविंग रूम की रोशनी घटाकर
सोफे पर पसर जाती है—
कभी एक किताब,
कभी कोई पुरानी फिल्म,
कभी बस
खामोशी की पंखुरी
जो उसके कंधे पर आकर बैठ जाती है।
और तभी
रात की पहली ठंड
कमरे में दाखिल होती है
वह एक चादर ओढ़ लेती है,
और उसमें लिपटकर
अपने आप के साथ
एक छोटी-सी बातचीत शुरू करती है।
मैं दूर से
उस चादर की नरमी में
उसके सुकून का आकार देखता हूँ।
कभी लगता है
कि यह चिड़िया
पूरे रविवार को
ताज़े पंखों से छूकर
धीरे-धीरे
अपने घोंसले में समेट लेती है—
ताकि कल जब
सप्ताह की तेज़ उड़ान
फिर से शुरू हो,
उसके पास
आज की यह मीठी गरमी
संभाल कर रखी हो।
और मैं…
मैं फिर भी उसी मौन में
उसकी शाम के चारों ओर
एक अदृश्य-सी परछाईं बना रहता हूँ—
बिना छुए,
बिना बोले,
बस यूँ ही
उसके दिन के आख़िरी पन्ने
धीमे-धीमे
अपने भीतर पढ़ता हुआ।
पाँच —
रविवार की शाम
अब पूरी तरह उतर आई है
धीमी, मुलायम,
जैसे किसी ने आसमान पर
नीली शॉल रख दी हो।
चिड़िया
अपने सारे काम निपटाकर
थोड़ी देर के लिए
बालकनी की मुंडेर पर आ बैठी है
सांसों में हल्की-सी थकान,
पर आँखों में
दिनभर की छोटी-छोटी जीतों की
गर्म चमक।
हवा में
सूरज की आख़िरी किरणें
अब भी तैर रही हैं
वह दोनों पंखों को
हल्का-सा फड़फड़ाती है,
जैसे दिन के बोझ को
धीरे से उतार रही हो।
नीचे सड़क पर
धीमा शोर है,
ऊपर आसमान में
दो-तीन तारे
समय से पहले ही
झाँकने लगे हैं।
वह उन्हें देखकर
एक नन्ही-सी मुस्कान रखती है
जैसे उनके आने से
शाम थोड़ी कम अकेली हो गई हो।
फिर वह उठकर
घर के अंदर लौटती है
रसोई में रखे बर्तन
सलीके से जमाती है,
पानी गर्म करके
अपने हाथों को
थोड़ी राहत देती है।
धीरे-धीरे
कमरे की रोशनी मंद होती है,
पर उसका मन
किसी शांत-सी रोशनी से
अब भी भरा हुआ है।
वह अपने बिस्तर पर
एक मुलायम तकिया लगाती है,
पैर समेटकर बैठ जाती है
शायद कोई हल्की-सी कहानी पढ़ने,
या सिर्फ़ खिड़की से
रात को बढ़ते हुए देखने।
और कहीं भीतर
एक धीमा-सा विचार उभरता है
कि रविवार का यह आख़िरी हिस्सा
उड़ान का नहीं,
बस ठहरने का होता है।
वह चादर ओढ़ते हुए
अपने दिल से कहती है
“आज की मुलायम शाम
कल की जल्दी में
मत खो जाना…”
और मैं…
दूर खड़ा
उस शाम की नर्म ख़ामोशी में
उसके चेहरे पर उतरती
थकी हुई, संतुष्ट रोशनी को
महसूस करता हूँ—
जैसे जाड़े की यह चिड़िया
अपने ही छोटे घर में
एक शांत, गरम घोंसला
हर रविवार की शाम
नवीन रूप से बुन लेती है।
मुकेश इलाहाबादी --------
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