मैं अपने ही साये में
धीमे-धीमे गुम हो जाना चाहता हूँ —
जैसे धुआँ
बेआवाज़
अंधेरे की छत पर चढ़ता है
और फिर कहीं भी नहीं रहता।
मुझे एक ऐसी ख़ामोश दरार चाहिए,
जहाँ हवा अपने पंख समेट ले,
जहाँ रौशनी
अपने ही कदमों की आहट से डरकर
पीछे मुड़ जाए,
और वक़्त—
चूड़ी-सी खनक लिए बिना
बस गुजरता रहे मेरे पास से।
मैं उस जगह की तलाश में हूँ
जहाँ लफ़्ज़ पैदा होने से पहले
मर जाएँ,
जहाँ ख़ामोशी
अपने जिस्म की राख
ख़ुद ओढ़ ले
ताकि कोई पहचान न सके
उस गीत को
जो कभी दिल में धड़कता था।
कभी-कभी
मेरी तमन्नाएँ
मुझे ऐसे निगल जाती हैं
जैसे कोई पुराना ख़त
सीलन में गलकर
अपनी ही स्याही पी जाए।
बिना स्वाद,
बिना चीख़,
बस एक बुझती हुई महक के साथ।
तुम नहीं जानोगे—
क्योंकि वो जगह
ज़मीन पर नहीं,
किसी नक़्शे में नहीं,
बल्कि मेरी हड्डियों की तहों के पीछे
एक सर्द गलियारा है
जहाँ मेरा नाम
बरसों से गूँगा पड़ा है।
मैं बस एक कोना चाहता हूँ—
इतना छोटा कि उसमें
चीख़ें भी सर रखकर सो जाएँ,
इतना गहरा कि मैं
मर भी जाऊँ
तो ज़िंदा दिखाई दूँ,
और जी भी लूँ
तो कोई पहचान न सके
कि यह मैं हूँ।
मुकेश इलाहाबादी ,,,,,,,,,,,,,
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