जब मुझे भी पीपल पर टाँग दिया जाएगा
जब मैं भी
दाह की राख से हल्का होकर
नाम की आख़िरी ध्वनि छोड़ दूँगा,
और शुद्धि तक
पीपल के तने पर
घण्टे की तरह टाँग दिया जाऊँगा
एक मटिया में जल होगा,
दूसरी में काँपता दीप,
और लोग कहेंगे—
“आत्मा आती है यहाँ,
प्यास बुझाने,
अँधेरे से राह पूछने।”
तब भी
क्या तुम आओगी?
हवा जब पत्तों को हिलाएगी,
और घण्टे-सा मेरा स्मरण
धीमे-धीमे बज उठेगा,
क्या तुम पहचानोगी
उस नाद में अपना नाम?
मैं जल की सतह पर
एक हल्की-सी लहर बनूँगा,
दीप की लौ में
एक क्षणिक ऊष्मा
बस इतना संकेत
कि प्रेम देह से नहीं बँधता।
लोग लौट जाएँगे,
विधि पूरी होगी,
मटियाएँ उतार ली जाएँगी—
पर मैं?
मैं उस पीपल की जड़ों में
तुम्हारे पदचिह्न खोजूँगा,
उसकी छाया में
तुम्हारी साँस का अक्स।
अगर सच है
कि आत्मा शुद्धि तक भटकती है,
तो मेरी भटकन
सिर्फ़ तुम्हारी ओर होगी।
और यदि कुछ भी सच नहीं
न आत्मा, न आना-जाना—
तो भी प्रेम का नाद
किसी घण्टे की तरह
तुम्हारे भीतर बजेगा।
जब मुझे
पीपल के तने पर
घण्टे-सा टाँग दिया जाएगा,
तब भी
मैं तुम्हें ही पुकारूँगा
जल में,
दीप में,
हवा की हर कंपन में।
क्योंकि मृत्यु
सिर्फ़ देह को उतारती है,
प्रेम को नहीं।
और यदि कभी
संध्या के धुँधलके में
तुम्हें लगे
कि बिना छुए
किसी ने तुम्हारा नाम लिया है
समझ लेना,
मैं अभी भी
पीपल के नीचे
तुम्हारा इंतज़ार कर रहा हूँ।
मुकेश ,,,,
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