झुमका
कान की लोब पर झूलता हुआ
धातु का छोटा-सा ब्रह्मांड,
जिसमें वृत्त, घंटी और कंपन
एक साथ बसते हैं।
उसकी बनावट में
लोक-शिल्प की उँगलियों का इतिहास है—
कुंदन, मीना,
चाँदी की जाली,
सोने की महीन नक्काशी।
झुमका स्थिर नहीं रहता,
वो हर क़दम पर हिलता है
जैसे स्त्री की चाल में
ध्वनि का अदृश्य आभूषण जुड़ गया हो।
उसकी हल्की झंकार
सिर्फ़ सजावट नहीं,
उपस्थिति की घोषणा थी
घर के भीतर एक लय,
बाज़ार में एक पहचान।
उत्तर से दक्षिण तक
उसके रूप बदलते रहे—
कहीं मंदिर-शैली की भारी गोलाई,
कहीं बूँद-सा सादा आकार;
भूगोल ने भी
उसे अपना-अपना अर्थ दिया।
सिनेमा ने
उसे लोकप्रियता का नया मंच दिया,
गीतों में उसका नाम आया,
और शहर की लड़कियों ने
उसे फैशन का प्रतीक बना लिया।
पर समय के साथ
हल्के स्टड्स और मिनिमल डिज़ाइन
रोज़मर्रा की ज़रूरत बन गए
झुमका अलमारी में टँग गया,
त्योहारों का मेहमान बनकर।
शोध कहता है
आभूषण देह-सौंदर्य से अधिक
सांस्कृतिक संकेत होते हैं;
झुमका स्त्री की गति,
ध्वनि और दृश्य उपस्थिति
तीनों का संगम था।
जब भी कोई स्त्री
फिर से झुमका पहनती है,
तो कान के पास
एक छोटा-सा इतिहास
फिर से झूलने लगता है।
झुमका केवल गहना नहीं
वो स्मृति की वह घंटी है
जो हर हल्के स्पर्श पर
समय को फिर से बजा देती है।
मुकेश ,,,,,,
No comments:
Post a Comment