मेरे कंधों पर
किसी और के नहीं,
मेरे ही बोझ की परछाइयाँ हैं,
जो हर मौसम में
रंग बदल लेती हैं।
आईने में देखता हूँ तो
चेहरा वही है,
पर आँखों के पीछे
कई अधबुने मौसम अटके पड़े हैं।
कमरे की दीवारों पर
कुछ फीकी पड़ चुकी तस्वीरें हैं,
कुछ टंगी हुई आवाज़ें,
जो अब भी मुझे नाम लेकर बुलाती हैं
और मैं हर बार
थोड़ा-सा चौंक जाता हूँ।
मेरे चारों ओर
रिश्तों का एक महीन जाल है,
इतना महीन
कि दिखता नहीं,
पर ज़रा-सी हरकत पर
कहीं न कहीं कंपन उठ जाता है।
मैं अक्सर सोचता हूँ
क्या सचमुच मैं ही हूँ
जो सबको थामे हुए हूँ?
या सबने मिलकर
मुझे ही बाँध रखा है?
समय
मेरे कमरे की खिड़की से
चुपचाप भीतर आता है,
कुर्सी पर बैठता है,
और बिना कुछ कहे
मेरे हिस्से की रौशनी
थोड़ी-सी कम कर देता है।
दिन भर की भाग-दौड़ के बाद
जब शाम अपनी धीमी चादर फैलाती है,
तो भीतर एक हल्की-सी थकान
सवाल बनकर उभरती है
क्या सच में जो मेरे पास है
वही मेरा है?
और जो चला गया,
क्या वह कभी मेरा था?
हथेलियों में कसकर पकड़ी हुई चीज़ें
क्यों रेत की तरह
दरारों से फिसल जाती हैं?
मैं जानता हूँ—
यह कोई रहस्य नहीं,
न ही किसी अदृश्य शक्ति का खेल।
यह बस वही क्रम है
जिसमें भराव के बाद
रिक्तता आती है,
और रिक्तता के बाद
फिर किसी नए अर्थ की शुरुआत।
जीवन शायद
किसी पात्र का नाम नहीं,
बल्कि उस पात्र के
धीरे-धीरे खाली होने की प्रक्रिया है
ताकि उसमें
कुछ और गहरा,
कुछ और सच्चा
समा सके।
और मैं
अब डरता नहीं उस खालीपन से।
मैं उसे जगह देता हूँ—
जैसे रात
दिन को जगह देती है।
क्योंकि शायद
जो कुछ घट रहा है,
वह विनाश नहीं,
परिवर्तन की
सबसे धीमी,
सबसे सटीक चाल है।
मुकेश ,,,,,,,,,
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