फिराक़ को पढ़ना
जैसे रात की तह में उतरना है—
जहाँ शब्द दीये नहीं,
धीमे-धीमे सुलगते अंगारे हैं।
वे कहते हैं—
“रात यूँ दिल में तेरी खोई हुई याद आई,
जैसे वीराने में चुपके से बहार आ जाए…”
और सचमुच,
उनकी एक पंक्ति
उजाड़ मन में
अचानक हरियाली उगा देती है।
उनकी रात
सिर्फ़ अँधेरा नहीं,
स्मृति का आकाश है।
वहीं कहीं से
एक और आवाज़ आती है—
“अब तो घबरा के ये कहते हैं कि मर जाएँगे,
मर के भी चैन न पाया तो किधर जाएँगे…”
यह शेर नहीं,
बेचैन आत्मा की धड़कन है—
जीवन से भी प्रश्न,
मृत्यु से भी।
फिराक़ के यहाँ
इश्क़ महज़ रूमानी रंग नहीं,
एक विचार है,
एक प्रतिरोध है,
एक स्वाधीन आत्मा का आग्रह।
वे लिखते हैं—
“दिल में अब यूँ तेरे भूले हुए ग़म आते हैं,
जैसे बिछड़े हुए काबे में सनम आते हैं…”
यहाँ प्रेम
धर्मों की सीमाएँ लाँघकर
मानव की गहराई में उतर जाता है।
उनकी शायरी में
गंगा-जमुनी तहज़ीब की महक है,
भाषा में नफ़ासत,
और भीतर कहीं
अकेलेपन की धीमी जलन।
अंग्रेज़ी के अध्यापक थे,
पर दिल उर्दू की लय में धड़कता था।
विचार की कठोरता
और प्रेम की कोमलता—
दोनों साथ।
फिराक़ को पढ़ते हुए
लगता है
हम किसी शायर को नहीं,
अपने ही भीतर की
एक अनकही आवाज़ को सुन रहे हैं।
किताब बंद हो जाती है,
पर एक पंक्ति
देर तक भीतर बोलती रहती है—
जैसे रात के सन्नाटे में
कोई धीमी-सी सरगम।
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