मैंने आज
दिल की अदालत में
एक अर्ज़ी दाख़िल की है
इश्क़ के सिलसिले को
कुछ मुद्दत के लिए
मुल्तवी किया जाए।
दलील यह है
कि रूह अभी
गुज़िश्ता सदमात से उबर नहीं पाई,
ज़ख़्मों की तह में
नमक अब भी तर है,
और ख़्वाबों की तामीर
बार-बार मुनहदिम हो जाती है।
मैंने कहा
मोहब्बत कोई तजुर्बा-ए-लफ़्ज़ नहीं,
एक पूरा वजूद माँगती है।
और मेरा वजूद
इस वक़्त
इंतिशार में मुब्तिला है।
इश्क़ ने मुस्कुराकर पूछा
“क्या तुम वाक़ई आज़ाद होना चाहते हो,
या महज़ तख़्लीफ़ से फ़रार?”
मैं ख़ामोश रहा।
क्योंकि सच यह है
हर इन्कार की तह में
एक दबा हुआ इक़रार होता है।
मैंने फिर भी लिखा
कि दिल की सरहदों पर
कुछ अरसा अमन रहे,
जज़्बात की आमद पर
कड़ी निगरानी हो,
और किसी नए ख़्वाब को
दाख़िले की इजाज़त न दी जाए।
मगर उसी रात
एक पुरानी सदा
रग-ए-जाँ में उतर आई
बेख़याली में लिया गया
किसी का नाम,
और फिर
धड़कनों का बे-तरतीब हो जाना।
मैं समझ गया
इश्क़ कोई मुक़द्दमा नहीं
जिसे तारीख़ पर टाला जा सके।
वह तो
बिना दस्तख़त,
बिना मुहर,
दिल के काग़ज़ पर
अपना हुक्म लिख देता है।
इश्क़ का स्थगन-पत्र
अब भी मेज़ पर पड़ा है
न मंज़ूर हुआ,
न नामंज़ूर।
शायद मोहब्बत
इंतज़ार नहीं करती,
वह बस
मौक़ा देखती है
और रूह की वीरान गली में
अचानक दस्तक दे देती है।
मैंने अर्ज़ी तह करके रख दी है
कि जब भी अगली बार
दिल की अदालत बैठे,
मैं यह कबूल कर सकूँ
इश्क़ मुल्तवी नहीं होता,
वह सिर्फ़
और गहरा हो जाता है।
मुकेश ,,,,,,,,
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