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Thursday, 19 February 2026

कोई ज़रूरी तो नहीं प्रेम किया ही जाए

 कोई ज़रूरी तो नहीं

प्रेम किया ही जाए

जैसे हर मौसम का

बसंत होना अनिवार्य नहीं।


कुछ लोग

बिना इज़हार के भी

जी लेते हैं उम्र भर,

साफ़-सुथरे,

बिना उलझनों के।


प्रेम कोई नियम नहीं,

न सामाजिक अनिवार्यता,

न आत्मा की परीक्षा।


वह तो बस

एक आकस्मिक वर्षा है

कभी बरसती है,

कभी बादल होकर ही

गुज़र जाती है।


किसी के हिस्से

धूप अधिक आती है,

किसी के हिस्से

लंबी, शांत संध्या।


और यह भी सच है—

प्रेम न करने में भी

एक तरह की शांति है,

एक संयमित ठहराव।


पर फिर भी

कभी-कभी

अचानक कोई स्मृति,

कोई स्वर,

कोई चेहरा

अंदर हल्की-सी लहर जगा देता है।


तब समझ आता है

प्रेम किया जाए या नहीं,

यह हमारे वश में कहाँ।


वह हो जाता है,

जैसे साँस,

जैसे धड़कन

बिना अनुमति।


और तब यह प्रश्न

खुद ही चुप हो जाता है।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,

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