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Thursday, 19 February 2026

दिल का एतराज़ दर्ज है

 मैंने आज

अपने ही वजूद के हाशिए पर

धीमे से लिख दिया है,

दिल का एतराज़ दर्ज है।


दुनिया ने जो फ़ैसले सुनाए,

अक़्ल ने जिन पर दस्तख़त किए,

रिवायत ने जिन्हें सही ठहराया,

दिल उन सब पर

ख़ामोश नहीं रहा।


उसने कहा,

यह जो समझौते हैं,

इनमें कुछ कमी है।

यह जो मुस्कुराहट है,

इसमें कोई नमी है।


मैंने उसे समझाया

कि हर जज़्बा मुक़द्दमा नहीं होता,

हर चाहत की पैरवी

ज़रूरी नहीं।

मगर वह अपनी जगह अड़ा रहा,

जैसे कोई नर्म आवाज़

बारिश के बाद भी

मिट्टी में गूंजती रहती है।


दिल का एतराज़

शोर नहीं करता,

वह सिर्फ़ धड़कनों की ज़बान में

अपना बयान देता है।


जब भी मैं

मुनासिब और नामुनासिब के बीच

रेखाएँ खींचता हूँ,

वह उन रेखाओं पर

अपनी उँगली फेर देता है,

कि ज़िंदगी सीधी लकीरों से

कभी मुकम्मल नहीं होती।


मैंने आज

उसके एतराज़ को

रद्द नहीं किया,

न ही मंज़ूर किया।

बस उसे

दर्ज रहने दिया है,


कि शायद

इसी मुख़ालिफ़त में

मेरी असल पहचान छुपी है।


और अगर दिल

एतराज़ न करे,

तो इश्क़

किस बात का हो।


मुक़ेश,,,,,,,,,,

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