मैंने आज
दिल की अदालत में
एक अर्ज़ी दाख़िल की है,
जज़्बे-ए-कशिश के ख़िलाफ़।
इल्ज़ाम यह है
कि वह हर बार
बिना दस्तक
रूह में दाख़िल हो जाता है,
नज़र की तह में
एक हल्की सी चमक रख देता है,
और फिर
तमाम तदबीरें बेमानी हो जाती हैं।
मैंने लिखा,
हुज़ूर,
यह जज़्बा बारहा
मेरे सुकून को मुतअस्सिर करता है।
जब भी किसी चेहरे पर
रोशनी ठहरती है,
या किसी आवाज़ में
नर्मी का कोई मोड़ आता है,
यह दिल को
अपनी तरफ़ खींच लेता है।
दरख़्वास्त है
कि इसे हद में रखा जाए,
इसकी रस्सियाँ कसी जाएँ,
ताकि नज़र
हर परछाईं को आफ़ताब न समझे,
और हर मुस्कान
इश्क़ का पैग़ाम न लगे।
मगर जैसे ही
मैंने आख़िरी सतर पूरी की,
कशिश ख़ुद कटघरे में आ खड़ी हुई।
वह बोली,
अगर मैं न रहूँ
तो रंगों की क्या हैसियत,
लम्स की क्या तासीर,
और धड़कन का क्या मतलब।
क्या तुम
सिर्फ़ हिसाब की ज़िंदगी चाहते हो,
जहाँ न कोई खिंचाव हो
न कोई सरगोशी
जो रात को बेचैन करे
और सुबह को रौशन।
मैं ख़ामोश रह गया।
सच तो यह है
कशिश ही वह पहली सीढ़ी है
जहाँ से इश्क़ की राह निकलती है,
और इश्क़ ही वह आग
जो रूह को ज़िंदा रखती है।
मैंने अर्ज़ी फाड़ दी,
काग़ज़ के टुकड़े
हवा में ऐसे बिखरे
जैसे इकरार के सफ़ेद परिंदे।
अब जब भी
कोई नज़र मुझे छूती है,
मैं अदालत नहीं जाता,
बस दिल की खिड़की खोल देता हूँ।
कि जज़्बे-ए-कशिश
दरअसल कोई जुर्म नहीं,
वह तो रब की रखी हुई
एक नर्म सी तदबीर है
ताकि हम
एक-दूसरे की तरफ़
झुक सकें।
मुक़ेश,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
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