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Wednesday, 18 February 2026

हवा के पुल पर ख़्वाब की महक

 हवा के पुल पर आज

रात की रानी की तल्ख़-तर महक

सेहन की सरहदें लाँघ कर

फिज़ाओं में एक ख़ामोश इंक़लाब ले आई है।


कमरे के सन्नाटे में

जहाँ ख्वाबों की शहज़ादी

बिखरे बालों में उलझी हुई,

मेरे सीने की ठंडी ज़मीन पर

एक फ़ानी लम्हे को

अबद के इंतिहा से जोड़ रही है।


वो जो लम्स की आँखों में

क़ोस-दर-क़ोस तिलिस्म बनकर चमकते थे,

आज हवा में

किसी अदृश्य इश्क़ के नक़्श छोड़ते जा रहे हैं।

हवा के इस पुल पर—

जहाँ न मंज़िल तय होती है

न रस्ते वज़नी होते हैं—

बस साँसें हैं

जो महकती हैं,

जैसे किसी अलिफ़ लैला की नफ़ासत

ख़्वाबों के गर्द-ओ-गुबार से निकलकर

ज़ीस्त के पानी को महका दे।


जिस्म की शाख़ से झड़ चुका फूल

अब महक बन गया है

जो लफ़्ज़ों से नहीं,

फ़ज़ा से बयाँ होता है।


और इस हवा के पुल पर

जहाँ हर साज़ सिसकती हवा का हिस्सा है,

वहीं कहीं

किसी जश्न-ए-नौरोज़ की राख

मामूल की मौत के नीचे

इक नई मोहब्बत की बीज बो रही है—

बे-आवाज़, बे-तारीख़,

मगर बेहद जिंदा।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,

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