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Wednesday, 18 February 2026

हवा के पुल - मै और तुम

 हमने

हवा के पुल बनाए थे

बिना ईंट, बिना पत्थर,

सिर्फ़ यक़ीन की पतली-सी डोर से।


तुम उस पार थीं,

मैं इस पार

बीच में कोई नदी नहीं थी,

फिर भी

फासलों का एक गहरा बहाव था।


हमने लफ़्ज़ों की जगह

साँसों को रखा,

और खामोशी की लकड़ियों से

एक नाज़ुक-सा रास्ता जोड़ दिया।


हवा के पुल

मज़बूत नहीं होते

वे भरोसे पर टिके रहते हैं,

और ज़रा-सी शंका

उन्हें हिला देती है।


कभी-कभी

जब तुम देर तक चुप रहती हो,

तो मुझे लगता है

पुल का कोई सिरा

ढीला पड़ गया है।


फिर अचानक

तुम्हारी हँसी की एक हल्की लहर

आकर उसे फिर से बाँध देती है।


हवा के पुलों पर

चलना आसान नहीं

यहाँ पाँव से ज़्यादा

दिल संतुलन बनाता है।


और अगर गिर भी जाओ,

तो चोट ज़मीन पर नहीं,

सीधे भीतर लगती है।


फिर भी

मैं हर रोज़

एक नया हवा का पुल बनाता हूँ

तुम तक पहुँचने के लिए,

क्योंकि पत्थरों के रास्ते

हमारे बीच कभी बने ही नहीं।


मुकेश ,,,,,,,,,,

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