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Friday, 20 February 2026

काम-शास्त्र में वर्णित नख-क्षत (नाखून-चिह्न)

 काम-शास्त्र में वर्णित नख-क्षत (नाखून-चिह्न)

को प्रेम, मनोविज्ञान और आत्मिक प्रतीक के रूप में

नज़्मों की शृंखला में प्रस्तुत कर रहा हूँ—

जहाँ चिह्न शरीर पर हैं,

पर अर्थ चेतना में।


1. कुंडल नख-क्षत (Kundala)


(वृत्ताकार चिह्न)


यह चिह्न

घाव नहीं,

वृत्त है

जैसे प्रेम

लौटकर

फिर वहीं आ गया हो।


यह बताता है

जो छुआ गया,

वो छोड़ा नहीं गया।


2. अर्धचंद्र नख-क्षत (Ardha-Chandra)

(अर्धवृत्त)


पूरा नहीं,

फिर भी सुंदर

जैसे अधूरा वाक्य

जो

मन में गूँजता रहे।


यह चिह्न

विरह का

कोमल स्मरण है।


3. बिंदु नख-क्षत (Bindu)

(छोटा चिह्न)


इतना छोटा

कि दिखे न दिखे,

पर

मन जानता है

यहाँ

कभी कोई

बहुत पास था।


4. रेखा नख-क्षत (Rekha)

(सीधी रेखा)


यह प्रेम का

हस्ताक्षर है

स्पष्ट,

बिना संकोच।


यह कहता है

मैं आया था,

और

डरा नहीं।


5. व्याघ्र नख-क्षत (Vyāghra)

(तीव्र, गहरा)


यह उग्रता नहीं,

विश्वास है—

कि सामने वाला

डरकर टूटेगा नहीं।


यह चिह्न

साहस का

प्रमाण है।


6. मयूरपद नख-क्षत (Mayurapada)

(पंख जैसे चिह्न)


यह सौंदर्य का

उत्सव है

जहाँ प्रेम

सिर्फ़ गहरा नहीं,

सुंदर भी है।


7. संगत नख-क्षत (Sangata)

(एकाधिक चिह्न)


यह स्मृति है

कि प्रेम

एक क्षण नहीं था,

एक

अनुभव था।


8. विरह नख-क्षत (Vipralambha)

(दूरी में जलता चिह्न)


यह चिह्न

समय के साथ

मिट जाता है,

पर

भाव

और गहरा हो जाता है।


9. आत्मिक नख-क्षत 

(शास्त्र से परे)


यह चिह्न

त्वचा पर नहीं,

अहं पर पड़ता है

जहाँ प्रेम

“मैं” को

थोड़ा-सा

मिटा देता है।


समापन भाव


काम-शास्त्र

नख-क्षत को

चिह्न कहता है,

पर प्रेम

उसे

स्मृति की भाषा

बना देता है।


मुकेश ,,,,,,,,

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