काम-शास्त्र में वर्णित नख-क्षत (नाखून-चिह्न)
को प्रेम, मनोविज्ञान और आत्मिक प्रतीक के रूप में
नज़्मों की शृंखला में प्रस्तुत कर रहा हूँ—
जहाँ चिह्न शरीर पर हैं,
पर अर्थ चेतना में।
1. कुंडल नख-क्षत (Kundala)
(वृत्ताकार चिह्न)
यह चिह्न
घाव नहीं,
वृत्त है
जैसे प्रेम
लौटकर
फिर वहीं आ गया हो।
यह बताता है
जो छुआ गया,
वो छोड़ा नहीं गया।
2. अर्धचंद्र नख-क्षत (Ardha-Chandra)
(अर्धवृत्त)
पूरा नहीं,
फिर भी सुंदर
जैसे अधूरा वाक्य
जो
मन में गूँजता रहे।
यह चिह्न
विरह का
कोमल स्मरण है।
3. बिंदु नख-क्षत (Bindu)
(छोटा चिह्न)
इतना छोटा
कि दिखे न दिखे,
पर
मन जानता है
यहाँ
कभी कोई
बहुत पास था।
4. रेखा नख-क्षत (Rekha)
(सीधी रेखा)
यह प्रेम का
हस्ताक्षर है
स्पष्ट,
बिना संकोच।
यह कहता है
मैं आया था,
और
डरा नहीं।
5. व्याघ्र नख-क्षत (Vyāghra)
(तीव्र, गहरा)
यह उग्रता नहीं,
विश्वास है—
कि सामने वाला
डरकर टूटेगा नहीं।
यह चिह्न
साहस का
प्रमाण है।
6. मयूरपद नख-क्षत (Mayurapada)
(पंख जैसे चिह्न)
यह सौंदर्य का
उत्सव है
जहाँ प्रेम
सिर्फ़ गहरा नहीं,
सुंदर भी है।
7. संगत नख-क्षत (Sangata)
(एकाधिक चिह्न)
यह स्मृति है
कि प्रेम
एक क्षण नहीं था,
एक
अनुभव था।
8. विरह नख-क्षत (Vipralambha)
(दूरी में जलता चिह्न)
यह चिह्न
समय के साथ
मिट जाता है,
पर
भाव
और गहरा हो जाता है।
9. आत्मिक नख-क्षत
(शास्त्र से परे)
यह चिह्न
त्वचा पर नहीं,
अहं पर पड़ता है
जहाँ प्रेम
“मैं” को
थोड़ा-सा
मिटा देता है।
समापन भाव
काम-शास्त्र
नख-क्षत को
चिह्न कहता है,
पर प्रेम
उसे
स्मृति की भाषा
बना देता है।
मुकेश ,,,,,,,,
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