होम | रोज़नामचा | कविताएँ | कहानियाँ | विचार | ज्योतिष | लेखक

Saturday, 21 February 2026

सिल-बट्टा

 सिल-बट्टा : एक शोधात्मक नज़्म


रसोई की ज़मीन पर

चुपचाप पसरा है सिल

समतल, ठंडा, धैर्य से भरा।

उसकी पीठ पर टिका बट्टा,

मानो समय का गोल पत्थर,

जो स्वाद को आकार देता है।


यह सिर्फ़ औज़ार नहीं,

भारतीय पाक-परंपरा का पहला प्रयोगशाला है

जहाँ मसाले

अपनी-अपनी पहचान छोड़

एक सम्मिलित सुगंध बनते हैं।


हल्दी की पीली रेखा,

धनिया की हरी लकीर,

लाल मिर्च का तीखा बयान

सब सिल की देह पर

इतिहास लिखते रहे हैं।


शोध कहता है

धीमी पिसाई

तेज़ धार वाली मशीन से अलग होती है;

घर्षण की नियंत्रित ऊष्मा में

सुगंधित तेल सुरक्षित रहते हैं,

और मसाले

अपना पूर्ण रस देते हैं।

यह विज्ञान भी है,

और स्वाद का शास्त्र भी।


गाँव की सुबहों में

सिल-बट्टे की “चर्र-चर्र”

एक लय थी

जैसे कोई गुप्त राग

रसोई में साधा जा रहा हो।

स्त्रियों की कलाई की गति

सिर्फ़ श्रम नहीं,

एक सांस्कृतिक अभ्यास थी

पीढ़ियों से चली आती।


आयुर्वेदिक चूर्ण,

घरेलू लेप,

नवजात के लिए उबटन

सब इसी पत्थर पर घुले,

देह और स्वाद दोनों को

संस्कार देते हुए।


आज

मिक्सर की तेज़ घरघराहट में

सिल-बट्टा कम सुनाई देता है,

पर पुराने घरों के कोनों में

उस पर अब भी

हल्दी की हल्की पीली स्मृति जमी है।


सिल-बट्टा

दरअसल पत्थर नहीं,

धैर्य का पाठ है

जो सिखाता है

कि स्वाद और जीवन

धीरे-धीरे घिसकर ही

अपनी असली खुशबू देते हैं।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,

No comments:

Post a Comment