हवा में झूलता पुल
पतली रस्सियों पर टिका
एक काँपता यक़ीन,
जिसके नीचे
बर्फ़ की नदी
सफ़ेद ख़ामोशी ओढ़े बहती है।
नदी में पानी नहीं,
जमी हुई साँसें हैं
पुराने लम्हों की ठंडी परतें,
जिन्हें सूरज ने छुआ तो सही,
मगर पिघलाया नहीं।
पुल पर चलते हुए
हर क़दम
अपने ही डर की आवाज़ सुनता है,
रस्सियाँ हवा से पूछती हैं—
क्या यक़ीन भी यूँ ही झूलता है?
नीचे बर्फ़
धीरे-धीरे दरकती है,
जैसे रूह में
कोई दबा हुआ सिसकना
रास्ता खोज रहा हो।
हवा का झोंका
चेहरे को नहीं,
यादों को छूता है
और वे
सफेद धुएँ-सी उठकर
आसमान में घुल जाती हैं।
यह पुल
दो किनारों के बीच नहीं,
दो तापमानों के दरम्यान है
एक तरफ़ जमी हुई उदासी,
दूसरी तरफ़
पिघलने की हिम्मत।
मैं बीचों-बीच ठहरा,
सोचता हूँ
क्या हर बर्फ़ीली नदी के नीचे
अब भी पानी बहता है?
क्या हर काँपते पुल में
अब भी पहुँचने की संभावना बची रहती है?
हवा जवाब नहीं देती,
बस झुलाती रहती है
धीरे-धीरे,
लगातार,
जैसे इश्क़ किसी ठंडी रग में
गरम ख़ून भेज रहा हो।
और तभी
बर्फ़ की सतह पर
एक महीन दरार चमकती है
धूप की पतली लकीर उतरती है,
और जमी हुई नदी
भीतर से हल्की-सी पिघलती है।
पुल अब भी झूल रहा है,
मगर डर कम है
क्योंकि समझ में आ गया है,
कि हवा में झूलना गिरना नहीं,
विश्वास की दूसरी शक्ल है।
और बर्फ़ की नदी
वह अंत नहीं,
बस एक ठहराव है
जिसके नीचे
ज़िंदगी अब भी बह रही है।
मुकेश ,,,,,,,,,,
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