हवा के पुल पर
अब सांझ की आख़िरी रोशनी ठहरी है,
जैसे दिन ने
अपने सारे रंग उतारकर
एक फीकी-सी उदासी ओढ़ ली हो।
आसमान की पेशानी पर
नीला धुआँ-सा तैरता है,
और उस धुएँ में
तुम्हारी याद
किसी बुझते दीये की लौ की तरह
धीरे-धीरे काँपती है।
मैं इस पुल के बीच खड़ा हूँ,
न उस पार, न इस पार,
बस एक दरमियानी ठहराव में,
जहाँ सांस भी
इबादत बन जाती है।
हवा अब तेज़ नहीं चलती,
वह थकी हुई दरवेश है,
जिसने बहुत-से किस्से सुने,
बहुत-सी आँखों की नमी देखी,
और अब ख़ामोशी का चोग़ा पहनकर
सिर्फ़ महक छोड़ जाती है।
यह महक
न रात की रानी है, न चाँदनी,
यह किसी बिछड़े हुए लम्हे की खुशबू है,
जिसे वक़्त ने
पूरी तरह मिटाया नहीं।
उदासी यहाँ
कोई बोझ नहीं लगती,
वह रूह का वज़ू है,
जिससे होकर
इश्क़ और भी साफ़ दिखाई देता है।
मैंने जाना,
हर पुल एक दिन
अपने ही साए में खो जाता है,
हर ख़्वाब
एक दिन धड़कन में सिमट जाता है,
और हर मोहब्बत
आख़िरकार दुआ बन जाती है।
अब तुम्हारा नाम
मैं ज़ोर से नहीं लेता,
उसे बस भीतर रखता हूँ,
जैसे कोई तस्बीह
जिसकी गिरहें उँगलियों से नहीं,
आँसुओं से खुलती हैं।
हवा के पुल पर
यह आख़िरी क़दम
दरअसल कोई विदाई नहीं,
एक रूहानी रज़ामंदी है,
कि जो था, वही काफ़ी था,
जो नहीं है,
वह भी किसी और शक्ल में मौजूद है।
सांझ अब पूरी तरह उतर आई है,
पुल धुंध में घुल रहा है,
और मैं,
अपने ही भीतर के किनारे पर
चुपचाप बैठा हूँ।
उदासी की इस नर्म तह में
एक अनकही महक अब भी है
जो कहती है,
इश्क़ ख़त्म नहीं होता,
वह बस
हवा हो जाता है।
मुकेश ,,,,,,
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