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Wednesday, 18 February 2026

हवा के पुल पर ख़्वाब की महक – चौथा सफ़्हा

 .हवा के पुल पर

अब धूप भी उतरने लगी है,

हल्की, पारदर्शी,

जैसे किसी फ़क़ीर की हथेली पर रखी

सुनहरी चुप्पी।


तीसरे पहर की रौशनी में

जब साये अपने क़द से बड़े हो जाते हैं,

मैं देखता हूँ,

यह पुल अब सिर्फ़ रात का नहीं रहा,

दिन भी इस पर

अपनी थकान टाँग देता है।


तुम्हारी याद

अब महज़ महक नहीं,

एक आदत है,

जिसे मैं हर सुबह

अज़ान की तरह सुनता हूँ

और हर शाम

दीये की तरह जलाता हूँ।


सेहन में रखी वह खाली कुर्सी

अब शिकायत नहीं करती,

वह जानती है,

इश्क़ जिस्म की मौजूदगी से नहीं,

रूह की रवानी से आबाद रहता है।


हवा जब गुजरती है

तो परदों को नहीं,

मेरे भीतर के बंद दरवाज़ों को हिलाती है,

हर झोंका

एक सवाल बनकर आता है,

और हर सवाल

ख़ामोशी में घुलकर

जवाब हो जाता है।


मैंने देखा है,

इस पुल पर चलते-चलते

पाँव ज़मीन से हल्के हो जाते हैं,

और इंसान

अपनी ही परछाईं से आगे निकल जाता है।


वक़्त यहाँ

घड़ी की सुइयों में नहीं बसता,

वह धड़कनों की तह में छुपा

एक अनकहा वादा है,

कि जो बीत गया

वह दरअसल कहीं गया नहीं,

बस शक्ल बदलकर

रूह में बस गया है।


तुम तक पहुँचना

अब कोई मंज़िल नहीं,

एक सिलसिला है,

जो साँस और सन्नाटे के दरम्यान

बिना आवाज़ चलता रहता है।


हवा का पुल

अब दरवेश से बढ़कर

मुरशिद हो गया है,

वह सिखाता है

कि पकड़ने से कुछ नहीं मिलता,

छोड़ देने में

पूरा आसमान मिल जाता है।


और मैं

उस आसमान के नीचे खड़ा,

हथेलियाँ खोले,

तुम्हारी याद की बारिश में भीगता हुआ

इतना भर जान पाया हूँ


कि ख़्वाब अगर सच्चे हों

तो वे टूटते नहीं,

बस एक और सफ़्हा खोल देते हैं।


और हर नया सफ़्हा

मुझे फिर उसी हवा के पुल पर

ला खड़ा करता है

जहाँ महक अब भी ठहरी है,

मगर मैं

पहले जैसा नहीं रहा।


मुकेश ,,,,,,,

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