अष्टमी की रात का चाँद और तुम
अष्टमी की रात का चाँद
अब आधे से अधिक भर चुका है,
रोशनी में एक गंभीरता उतर आई है,
जैसे उजाला अब खेल नहीं,
प्रतिज्ञा हो गया हो।
रात का आकाश
नीला नहीं, गहरा है
उस गहराई में
चाँद स्थिर है, निर्विकार।
और तुम,
मेरे भीतर उसी स्थिरता का नाम।
सप्तमी तक जो विश्वास था,
अष्टमी में वह निर्णय बन जाता है।
अब रोशनी केवल फैलती नहीं,
दिशा भी देती है।
तुम्हारी आँखों में
अब शरारत से अधिक समझ है,
तुम्हारी मुस्कान में
अब आकर्षण से अधिक आश्वासन।
अष्टमी का चाँद
आधा नहीं,
अधूरा भी नहीं
वह बढ़ते हुए पूर्ण का वचन है।
और तुम
मेरे जीवन में उसी वचन की तरह उतरे हो,
धीरे-धीरे,
पर स्थायी रूप से।
इस रात में हवा तेज़ नहीं,
पर गहरी है।
जैसे कोई भीतर से कह रहा हो
अब लौटना नहीं है,
अब रुकना नहीं है,
अब यह उजाला अपनी मंज़िल तक जाएगा।
तुम्हारे होने से
मेरी खामोशियाँ अब तप बन गई हैं,
मेरी इच्छाएँ प्रार्थना,
और मेरी प्रतीक्षा साधना।
अष्टमी की रात का चाँद और तुम
दोनों ही बढ़ते हुए प्रकाश,
दोनों ही गंभीर,
दोनों ही यह सिखाते हुए
कि प्रेम केवल महसूस नहीं किया जाता,
उसे निभाया भी जाता है।
अब अगली रात
नवमी की रात का चाँद
जहाँ रोशनी में तेज़ आ जाएगा,
और प्रेम में आत्मविश्वास।
मुकेश ,,,,,,,,,,,
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