सप्तमी की रात का चाँद और तुम
सप्तमी की रात का चाँद
अब संकोच छोड़ चुका है,
रोशनी पूरी फैल रही है,
जैसे मन ने भी अपने डर उतार दिए हों।
आधी-अधूरी बातें
अब स्पष्ट होने लगी हैं,
और रात की खामोशी
विश्वास में बदल गई है।
तुम वहाँ हो
चाँद की उस साफ़, स्थिर रोशनी की तरह
जो न चौंकाती है,
न चुभती है,
बस सब कुछ साफ़-साफ़ दिखा देती है।
छठी रात तक जो भाव
संकेतों में थे,
सप्तमी में वे स्वीकार बन जाते हैं।
अब न छुपाना है,
न टालना है—
बस होना है।
तुम्हारे होने से
रात में ठहराव आ गया है,
दिल की धड़कन
अब हड़बड़ी में नहीं,
लय में चल रही है।
सप्तमी का चाँद
पूर्णता से एक कदम पहले का संतुलन है,
और तुम—
मेरे भीतर उसी संतुलन का नाम हो।
न अति-उत्साह,
न अधीर प्रतीक्षा,
बस एक गहरी शांति,
जिसमें प्रेम स्थिर होकर बैठ गया है।
सप्तमी की रात का चाँद और तुम
दोनों ही स्पष्ट,
दोनों ही भरोसेमंद,
और दोनों ही यह कहते हुए
कि अब जो आएगा,
वह केवल उजाला होगा।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,
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