कजरौटा
अलमारी की कोठरी में
पीतल का छोटा-सा कजरौटा
ढक्कन खोलते ही
रात की एक रेखा
उँगली पर उतर आती है।
दादी कहती थीं
“काजल आँख की हिफ़ाज़त है,
और नज़र से बचाने का ताबीज़ भी।”
फिर वह धीरे-से
मेरी पलकों के नीचे
एक महीन लकीर खींच देतीं
जैसे अँधेरे को
आँखों का घर दिखा रही हों।
कजरौटा
सिर्फ़ सौंदर्य का डिब्बा नहीं,
एक पूरा संस्कार है
जन्मे हुए शिशु के गाल पर
काला-सा टीका,
दुल्हन की आँखों में
गहरी झील का विस्तार,
और शाम को
आईने के सामने बैठी स्त्री का
अपना-सा एकांत।
कभी उसमें
दीए की लौ से बना काजल,
कभी बादाम की सुलगन,
कभी घी की बाती की कालिमा
हर घर की अपनी रीत,
अपना विज्ञान,
अपनी सुगंध।
रीतिकाल की नायिका
जब आँख उठाती है,
तो कजरौटे की ही देन है
वह गहराई
जिसमें प्रेम डूब जाता है।
आज
काजल की पेंसिलें
और ब्रांडेड शीशियाँ
ड्रेसिंग टेबल पर सज गई हैं,
पर वह छोटा-सा कजरौटा
कहीं संदूक के कोने में
अब भी प्रतीक्षा में है
कि कोई उँगली
फिर से उसमें डूबे,
और आँखों में
एक रेखा खींच दे
जो सिर्फ़ साज-सिंगार नहीं,
पीढ़ियों की स्मृति हो।
कजरौटा
दरअसल
रात का छोटा-सा पात्र है
जो आँखों में अँधेरा नहीं,
दृष्टि की गहराई भरता है।
मुकेश ,,,,,,,
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