रसोई से उठती
चाय की भाप
धीरे-धीरे कमरे तक चली आई है—
जैसे सुबह ने
अपने हाथों में गर्माहट भर ली हो।
तुम अब भी सो रही हो,
बंद पलकें
सपनों की किसी मुलायम राह पर।
मैं कप को
सावधानी से मेज़ पर रखता हूँ,
और देखता हूँ—
भाप की पतली लकीर
तुम्हारी ओर झुक रही है।
जैसे उसे भी
तुम्हारी उनींदी मुस्कान से
मोह हो गया हो।
तुम्हारी साँसें
धीरे-धीरे उठती हैं,
और भाप
उनकी लय में थरथराती है।
एक क्षण को लगता है—
चाय की खुशबू
तुम्हारे सपने में उतर गई है,
क्योंकि होंठों के कोने
हल्के-से हिले हैं।
मैं पास आकर
धीरे से फुसफुसाता हूँ
“सुबह हो गई…”
तुम पलकें नहीं खोलती,
बस मुस्कान गहरी हो जाती है
मानो कह रही हो,
“थोड़ी देर और…”
और मैं सोचता हूँ
कुछ सुबहें
सूरज से नहीं,
चाय की भाप
और बंद पलकों के बीच
जन्म लेती हैं।
मुकेश इलाहाबादी ,,,,,
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