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Friday, 20 February 2026

जवाब ज़मीन पर गिरा है

 जवाब ज़मीन पर गिरा है


कितने आँसू और बूँदें बहे

कि धरती को प्यासा न कहें?

कितनी चीख़ें उठें हवा में

कि आसमान अपना मुँह मोड़ ले?


कहाँ तक जाएगा इंसान

ख़ुद से बचने की कोशिश में?

कितने नक़्शे मिटाए जाएँ

कि सरहदें न रहें हथियार?


मेरे दोस्त, जवाब अब हवा में नहीं

जवाब ज़मीन पर गिरा पड़ा है 

सरेआम, लहूलुहान।


कितनी बार एक बच्चा रोए

बिना नाम, बिना देश के,

कि कोई उसे बच्चा माने

सिर्फ़ शरणार्थी नहीं?


कितनी बार सूरज उगे

बमों की परछाईं में,

और फिर भी हम उसे

उजाला कहें?


जवाब अब कोई गीत नहीं है

वो एक सवाल बन गया है 

जिसे हम टालते आ रहे हैं सदियों से।


कितने झूठ दोहराए जाएँ

कि वो सच लगने लगें?

कितनी बार "शांति" बोला जाए

जब हाथों में हो बंदूकें?


कितनी क़ब्रें चाहिए तुम्हें

अपने घर के नक़्शे पूरे करने को?

कितनी जिंदगियाँ कुर्बान हों

ताकि राष्ट्रगान सही सुर में गाया जा सके?


नहीं, अब जवाब उड़ नहीं रहा 

वो हमारे पैरों के नीचे दबा है,

सिसकता हुआ, दफ़्न।


मेरे दोस्त, उठो 

अब हवा नहीं, ज़मीन जवाब माँगती है।

हर साँस, हर क़दम — जवाब है।

तैयार हो या नहीं — अब सुनना होगा।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,

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