पत्थर के भीतर की आग
तुमने देखा होगा
एक चट्टान,
जो सदियों से वहीं है,
बिना हिले, बिना बोले,
वक़्त की धूप-छाँव सहती हुई
जैसे उसे कुछ महसूस ही न होता हो।
पर तुमने कभी
उसके भीतर उतर कर देखा है क्या?
जहाँ नमी
धड़कनों की तरह धरा रहती है,
जहाँ दरकने से पहले
हर सुराख़ एक दास्तान कहता है,
जहाँ अग्नि,
धीरे-धीरे अपनी साँसें गिनती है
एक लपट बनने के इंतज़ार में।
वो पत्थर जो ख़ामोश है
उसमें कई ज्वालाएँ दफ़्न हैं।
हर झरना जो उससे फूटा,
किसी टूटी हुई आस्था की ताबीर था।
हर दरार में
किसी चीख़ का गूंगा अक्स है।
लोग समझते हैं
वो थमा हुआ है,
पर वो थक गया है
सुनते-सुनते
दुनिया की आवाज़ें
और न सुने जाने का बोझ ढोते-ढोते।
वो जानता है
हर रोज़ कुछ पिघलता है उसमें
हर रात कुछ सुलगता है उसमें
और एक दिन
वो फटेगा
जैसे आत्मा की चुप्पी
बन जाए नारा।
पत्थर कभी पत्थर नहीं होता
अगर तुम उसकी ख़ामोशी से डरना सीख लो।
हर ठंडी सतह के नीचे
एक आग सो रही होती है
तैयार,
बोल पड़ने को।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,
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