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Sunday, 22 February 2026

एक आदमी का टूटना हमेशा शोर से नहीं होता

 एक आदमी का टूटना हमेशा शोर से नहीं होता


एक आदमी का टूटना

हमेशा शोर से नहीं होता।

कभी-कभी यह चुपचाप आता है,

जैसे रात की गहरी सन्नाटे में

धीरे-धीरे पानी की बूंद

पत्थर पर गिरती रहती है।

कदम-कदम पर अंदर की दीवारें हिलती हैं,

पर बाहर कोई नहीं देखता,

कोई सुनता नहीं।

हँसी जारी रहती है,

बोलने की आदत जारी रहती है,

लेकिन भीतर

सारा शहर ढह चुका होता है।

एक आदमी का टूटना

कभी कोई नहीं जानता,

न ही कोई तारीख़ तय कर सकता है।

यह बस होता है,

धीरे-धीरे,

और अकेलेपन के साथ।


मुकेश ,,,,,,,,,,

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