शब्द
हवा में चमगादड़ से लटक गए हैं,
उलटे,
अधनींद में,
अपने ही पंखों में लिपटे हुए।
दिन भर की बहसों के बाद
वे थककर
साँझ की कड़ी में अटक गए हैं।
अब कोई अर्थ
सीधा नहीं उतरता।
हर वाक्य
अँधेरे में रास्ता टटोलता है।
जैसे रोशनी से डरते हों
ये शब्द,
या शायद
रोशनी से पहले की
गहरी चुप्पी को साध रहे हों।
मैं पुकारता हूँ,
कोई एक वाक्य तो नीचे उतरे,
कंधे पर बैठे,
साफ़-साफ़ कुछ कहे।
पर वे
झूलते रहते हैं,
धीरे-धीरे हिलते,
कभी एक-दूसरे से टकराते,
कभी अपने ही प्रतिध्वनि से चौंकते।
रात गहराती है
तो लगता है
शायद यही उनका समय है,
अँधेरे में ही
वे अपनी दिशा पहचानते हैं।
और जब सुबह होगी,
तो शायद
इन उलटे लटके शब्दों में से
कोई एक
सीधा होकर गिरेगा
और अर्थ बन जाएगा।
मुकेश ,,,,,,,,,
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