सब कुछ कहा जा चुका था,
शब्द थककर बैठ गए थे,
वाक्य अपनी सीमा पर आकर
धीरे से टूट गए थे।
तभी सामने दिखी
मौन की एक दीवार,
सीधी, ठंडी, निर्विकार।
पहले लगा
यह अंत है।
पर ध्यान से देखा
तो उस दीवार में
एक महीन-सा रेखाचित्र था,
जैसे भीतर से किसी ने
धीरे-धीरे
एक द्वार तराशा हो।
कोई कुंडी नहीं,
कोई दस्तक नहीं
बस एक आहट।
मैंने आँखें बंद कीं
और बिना धक्का दिए
उससे होकर गुज़र गया।
उधर शब्द नहीं थे,
पर अर्थ थे।
उधर आवाज़ नहीं थी,
पर संवाद था।
समझ आया,
मौन दीवार नहीं,
एक छिपा हुआ प्रवेश-द्वार है।
जो बाहर से बंद दिखता है,
वह भीतर की तरफ़ खुलता है।
और शायद
हर सच्ची कविता
आख़िरकार हमें
उसी मौन तक ले जाती है
जहाँ कहना नहीं,
बस होना शेष रहता है।
मुकेश ,,,,,,,,
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