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Wednesday, 18 February 2026

अर्थ का अदृश्य गलियारा

 कविता का घर

जितना दिखता है,

उससे कहीं ज़्यादा छुपा होता है।


मुख्य द्वार से भीतर आते ही

कुछ पंक्तियाँ मुस्कुराती हैं,

कुछ सीधे-सीधे अर्थ बता देती हैं

पर असली रास्ता

किसी और तरफ़ मुड़ जाता है।


वहाँ एक अदृश्य गलियारा है

नक़्शे में दर्ज नहीं,

पर मौजूद।


वह शब्दों के पीछे से शुरू होता है,

और स्मृतियों की दीवारों के बीच

धीरे-धीरे लंबा होता जाता है।


चलते-चलते

अचानक लगता है

कि यह कविता नहीं,

अपना ही कोई भूला हुआ कमरा है।


जहाँ एक पुरानी आवाज़

अब भी गूँज रही है,

जहाँ किसी छूटे हुए स्पर्श की

हल्की-सी गर्मी बची है।


अर्थ का यह गलियारा

सीधा नहीं होता

कहीं सँकरा,

कहीं खुला,

कहीं बिल्कुल अँधेरा।


पर जो एक बार

इसमें उतर जाए,

वह जान लेता है

कविता पढ़ी नहीं जाती,

उसके भीतर चला जाता है।


और लौटते समय

हाथ में कोई शब्द नहीं,

बस एक अनुभव होता है

जिसका नाम

शायद अर्थ ही है।


मुकेश ,,,,,,

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